यमन संकट ने सऊदी अरब के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है. हूती हमलों और बाब अल-मंदेब से जुड़े खतरे के बीच रियाद को अपने सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य मदद नहीं मिली. ऐसे में उसने अमेरिका की मदद से इजरायल के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत का रास्ता अपनाया है.
सऊदी अरब इजरायल को स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता नहीं देता और दोनों के बीच राजनयिक रिश्ते भी नहीं हैं. इसके बावजूद रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी Centcom के जरिए इजरायल से खुफिया मदद मांगी. द जेरूसलम पोस्ट के अनुसार, बातचीत का मकसद हूती सैन्य ताकत से बचाव में सऊदी को जानकारी देना था. इजरायल हायोम ने बताया कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने दूसरे खाड़ी देशों और मिस्र से भी मदद मांगी. अमेरिका और ब्रिटेन ने सीधे हमले से इनकार किया. वहीं पाकिस्तान ने विदेशी जमीन पर लड़ने से मना कर दिया.
कई हफ्तों तक सऊदी ऊर्जा ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद हूतियों ने यमन में नया हमला किया. इसके बाद सऊदी समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट का विरोध कमजोर पड़ा और हूतियों ने लाल सागर के किनारे कई इलाकों तथा बाब अल-मंदेब के द्वीपों पर नियंत्रण कर लिया. हूती नेताओं ने सऊदी जहाजों की नाकाबंदी जारी रखने की बात कही है. इससे सऊदी तेल कारोबार पर दबाव बढ़ गया है. बाब अल-मंदेब एक अहम समुद्री रास्ता है और यहां खतरा बढ़ने से सऊदी के तेल निर्यात के साथ क्षेत्रीय व्यापार पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ी है.
इजरायल खुद भी हूती हमलों का सामना कर चुका है. गाजा युद्ध शुरू होने के बाद हूतियों ने लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों को निशाना बनाया था. मौजूदा हालात में सऊदी को इजरायल की मदद सीधे सैन्य कार्रवाई के बजाय खुफिया जानकारी तक सीमित रहने की संभावना है. रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल के रक्षा अधिकारियों ने भी हूतियों के खिलाफ किसी कार्रवाई को अकेले करने के बजाय बड़े अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समूह के साथ करने की सलाह दी है. दोनों देशों के बीच यह संपर्क बेहद संवेदनशील है लेकिन यमन से बढ़ते खतरे ने सऊदी अरब को ऐसे विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है.