फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के बीच एक ऐसा मुद्दा उभरकर सामने आया है, जिसका असर केवल यूरोप या रूस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है.
अमेरिका और G7 देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध को एक बार फिर अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने की दिशा में सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं.
मिडिल ईस्ट में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के कारण वैश्विक चर्चा का केंद्र बदल गया था. हालांकि अब हालात में कुछ स्थिरता आने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस पर दोबारा आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
G7 सम्मेलन में शामिल नेताओं ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर साझा चिंता व्यक्त की है. अमेरिका का मानना है कि रूस की ऊर्जा आय को सीमित किए बिना उस पर प्रभावी दबाव नहीं बनाया जा सकता. इसी वजह से रूसी तेल और उससे जुड़े नेटवर्क पर नए प्रतिबंधों की संभावनाएं बढ़ गई हैं. ब्रिटेन और कनाडा ने रूस के तथाकथित शैडो फ्लीट यानी ऐसे तेल टैंकरों और नेटवर्क पर कार्रवाई की घोषणा की है, जिनके माध्यम से रूस वैश्विक बाजार में तेल निर्यात जारी रखे हुए है. इन कदमों का उद्देश्य रूस की आय के प्रमुख स्रोतों को प्रभावित करना है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं और तेल आयातकों में शामिल है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है. इससे देश को वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों के बावजूद अपेक्षाकृत सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद मिली है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों को और कड़ा करते हैं तो भारतीय कंपनियों के लिए तेल खरीद और भुगतान प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है. इससे आयात लागत बढ़ने और घरेलू बाजार पर दबाव पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है.
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस पर नए प्रतिबंध लागू होते हैं या मौजूदा छूट समाप्त हो जाती है, तो वैश्विक तेल बाजार में नई अस्थिरता देखने को मिल सकती है. इसका प्रभाव केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आयातक देशों की आर्थिक योजनाओं और मुद्रास्फीति पर भी पड़ सकता है.