China Air Defense System: जब अमेरिका ने वर्षों पहले 'गोल्डन डोम' नामक एक महत्वाकांक्षी मिसाइल-रक्षा कार्यक्रम की परिकल्पना की थी, तब उसका उद्देश्य स्पष्ट था, पृथ्वी को एक ऐसे अंतरिक्ष कवच में ढाल देना जो किसी भी दिशा से आने वाले परमाणु खतरे को निष्क्रिय कर दे. मगर बीजिंग ने वह कर दिखाया, जिसे वाशिंगटन अब तक केवल सपनों में गढ़ रहा था.
चीन ने हाल ही में ‘बिग डेटा प्लेटफॉर्म’ नामक एक वैश्विक मिसाइल रक्षा नेटवर्क का प्रोटोटाइप न सिर्फ विकसित किया, बल्कि उसे सक्रिय रूप से तैनात भी कर दिया है. और इस कदम ने विश्व शक्ति-संतुलन के समीकरण को झकझोर कर रख दिया है.
नानजिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी के प्रमुख वैज्ञानिक ली जुदोंग के नेतृत्व में विकसित यह प्रणाली, पृथ्वी के किसी भी हिस्से से चीन पर दागी गई 1000 तक मिसाइलों को एक साथ ट्रैक करने में सक्षम है. यह नेटवर्क अंतरिक्ष, समुद्र, वायु और भूमि पर फैले सेंसरों से आने वाले डेटा को एकीकृत करता है और रियल-टाइम में खतरे की पहचान, विश्लेषण और प्रतिक्रिया तय करता है.
इसकी सबसे बड़ी ताकत केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामरिक सोच में है. पीएलए की यह प्रणाली पारंपरिक रडार और उपग्रह सीमाओं से परे जाकर मल्टी-सोर्स डेटा इंटीग्रेशन और एआई-संचालित निर्णय-निर्माण पर आधारित है.
इसके विपरीत, अमेरिका का 'गोल्डन डोम' कार्यक्रम अब भी अस्पष्टता और बजट विवादों में उलझा है. ट्रंप प्रशासन ने इसका खाका पेश किया था, एक अंतरिक्ष आधारित, एआई चालित रक्षा ढाल, जो किसी भी मिसाइल को उड़ान भरते ही खत्म कर सके. मगर पेंटागन के भीतर बजटीय खींचतान, तकनीकी मतभेद और नौकरशाही देरी ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया.
जुलाई में अमेरिकी स्पेस फोर्स के जनरल माइकल गुएटलिन ने खुद स्वीकार किया कि किसी को भी, यहां तक कि मुझे भी गोल्डन डोम की वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं है.
विश्लेषकों का मानना है कि चीन की यह उपलब्धि केवल तकनीकी छलांग नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति परिवर्तन का संकेत है. जहां अमेरिका अभी भी रक्षा के भविष्य की रूपरेखा बना रहा है, वहीं चीन ने उसे हकीकत का रूप दे दिया है. यह अंतर न केवल रक्षा रणनीति में बल्कि वैश्विक नेतृत्व की धारणा में भी बड़ा फर्क लाएगी.