नई दिल्ली: कनाडा ने अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव करने का संकेत दिया है. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने साफ कहा है कि अब देश सैन्य खरीद के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहेगा. उन्होंने इसे बदलते वैश्विक माहौल में जरूरी कदम बताया. लंबे समय से कनाडा अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर रहा है, लेकिन अब सरकार घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है.
कनाडा की रक्षा खरीद का बड़ा हिस्सा अब तक अमेरिकी कंपनियों से आता रहा है. अनुमान के मुताबिक, लगभग 70 प्रतिशत सैन्य उपकरण अमेरिका से खरीदे जाते हैं. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस मॉडल को अब 'टिकाऊ नहीं' बताया है. उनका मानना है कि एक ही देश पर इतनी निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरी हो सकती है. इसलिए सरकार अब अपने रक्षा ढांचे को संतुलित और विविध बनाने की दिशा में कदम उठा रही है.
नई नीति के तहत कनाडा की सरकार स्थानीय रक्षा उद्योग को प्राथमिकता देने जा रही है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में अधिक से अधिक सैन्य उपकरण देश के भीतर ही विकसित और निर्मित किए जाएंगे. इससे न सिर्फ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि तकनीकी क्षमता भी मजबूत होगी. सरकार का लक्ष्य है कि कनाडा अपनी जरूरतों को खुद पूरा कर सके और विदेशी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो.
कनाडा और अमेरिका के बीच हाल के वर्षों में व्यापारिक तनाव भी बढ़ा है. ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ ने दोनों देशों के संबंधों में खटास पैदा की थी. इन घटनाओं ने कनाडा को यह सोचने पर मजबूर किया कि उसे अपनी आर्थिक और रक्षा नीतियों में अधिक स्वतंत्रता लानी होगी. यही वजह है कि अब सरकार नए विकल्पों पर विचार कर रही है.
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'सैन्य खर्च में हर डॉलर का 70 सेंट अमेरिका को भेजने के दिन' अब खत्म हो गए - कनाडाई पीएम कार्नी
— RT Hindi (@RT_hindi_) April 12, 2026
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने देश की रक्षा नीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया है। ओटावा सैन्य खरीद के लिए अमेरिका पर अपनी निर्भरता को कम करेगा।
मार्क कार्नी ने कहा कि देश… pic.twitter.com/vlT0jI4ywl
मार्क कार्नी ने इस बदलाव को वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप बताया है. उनका कहना है कि दुनिया तेजी से बदल रही है और ऐसे में देशों को अपनी रणनीतियों में लचीलापन लाना होगा. कनाडा का यह कदम सिर्फ रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा संकेत है. आने वाले समय में इसका असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी देखने को मिल सकता है.