नई दिल्ली: अमेरिका ने भारत समेत 40 से अधिक देशों पर चीन ट्रांसशिपमेंट के जरिए टैरिफ बचाने में मदद का आरोप लगाया है. अमेरिका का टैरिफ आरोप और चीन ट्रांसशिपमेंट विवाद अब वैश्विक व्यापार की बड़ी बहस बन गया है. अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि संदिग्ध कंपनियों की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी प्रणाली तैयार की जा रही है, जिससे सीमा शुल्क जांच और व्यापारिक कार्रवाई तेज होगी तथा शिपमेंट आंकड़ों का विश्लेषण करके संभावित उल्लंघनों पकड़ेगी.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुख्य व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने अपनी रिपोर्ट द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम में दावा किया है कि चीन ने ऊंचे टैरिफ से बचने के लिए कई देशों का इस्तेमाल किया. रिपोर्ट के अनुसार, चीन पर धारा 301 के तहत शुल्क लगने के बाद यह तरीका तेजी से बढ़ा. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि सामान को दूसरे देशों में मामूली प्रसंस्करण, नया लेबल, नई पैकेजिंग या बिलिंग में बदलाव कर वहां का उत्पाद दिखाया जाता है. इसके बाद वही उत्पाद अमेरिकी बाजार तक पहुंचता है.
रिपोर्ट में भारत के पुणे, गुजरात और चेन्नई के औद्योगिक क्षेत्रों का विशेष उल्लेख किया गया है. दावा किया गया है कि इन इलाकों के माध्यम से चीनी पंप और कंप्रेसर अमेरिकी बाजार में पहुंचे. हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रांसशिपमेंट का वास्तविक आकार अलग-अलग आकलनों पर आधारित है. इसका अनुमान 40 अरब डॉलर से 303 अरब डॉलर प्रतिवर्ष तक बताया गया है, इसलिए वास्तविक आंकड़ों पर बहस जारी है.
अमेरिका डिटेक्टिव बॉर्डर नाम की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली विकसित कर रहा है. यह केवल दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरे व्यापारिक नेटवर्क का विश्लेषण करेगी.
यह प्रणाली इन बिंदुओं की जांच करेगी;
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यदि कोई कंपनी नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है तो उसके खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ, भारी जुर्माना, सीमा शुल्क कार्रवाई और व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. अधिकारियों का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से संदिग्ध खेपों की पहचान पहले से अधिक तेजी और सटीकता के साथ की जा सकेगी. यह मामला भारत, चीन और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी महत्वपूर्ण असर डाल सकता है. फिलहाल रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों पर विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाओं का इंतजार है.