अल-अक्सा मस्जिद पर बढ़ा तनाव: जॉर्डन ने बुलाई इस्लामिक देशों की आपात बैठक, आखिर क्या है पूरा विवाद?
यरूशलम की अल-अक्सा मस्जिद को लेकर तनाव बढ़ गया है. जॉर्डन ने इस्राइल पर ऐतिहासिक धार्मिक व्यवस्था बदलने का आरोप लगाते हुए मुस्लिम देशों की आपात बैठक बुलाई है. जानिए पूरा विवाद और इसके क्षेत्रीय असर.
नई दिल्ली: यरूशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद परिसर को लेकर एक बार फिर पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया है. जॉर्डन ने आरोप लगाया है कि इजराइल की ओर से अल-अक्सा मस्जिद परिसर की ऐतिहासिक और कानूनी व्यवस्था को बदलने की कोशिश की जा रही है. इसे गंभीर खतरा बताते हुए जॉर्डन ने अरब लीग और प्रमुख इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों की आपात बैठक बुलाई है. जॉर्डन का कहना है कि यदि मौजूदा व्यवस्था से छेड़छाड़ जारी रही, तो यह केवल इजराइल-फलस्तीन विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में बड़े धार्मिक टकराव की वजह बन सकता है.
तनाव उस समय और बढ़ गया, जब 23 जुलाई को इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्वीर की अगुवाई में करीब 2,000 इजराइली नागरिक अल-अक्सा मस्जिद परिसर में पहुंचे. रिपोर्टों के अनुसार वहां कुछ लोगों ने धार्मिक अनुष्ठान भी किए. जॉर्डन और फलस्तीनी प्रशासन ने इसे दशकों से चली आ रही यथास्थिति का उल्लंघन बताया है. उनका आरोप है कि इजराइल समर्थित कट्टरपंथी समूह धीरे-धीरे इस परिसर पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.
इसी घटनाक्रम के बाद जॉर्डन ने आपात बैठक बुलाने का फैसला किया है. इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के अलावा तुर्किये, इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों या उनके प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है. बैठक का उद्देश्य इस मुद्दे पर साझा रणनीति बनाना और इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाना है.
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जॉर्डन के विदेश मंत्री अयमान सफादी ने कहा कि यरूशलम 'बारूद का ढेर' बन चुका है और अल-अक्सा की मौजूदा व्यवस्था से किसी भी तरह की छेड़छाड़ पूरे क्षेत्र में हिंसा भड़का सकती है. उनका आरोप है कि इजराइल की नीतियां केवल धार्मिक विवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका असर वेस्ट बैंक में रहने वाले फलस्तीनियों के भविष्य पर भी पड़ सकता है. जॉर्डन को आशंका है कि यदि वेस्ट बैंक में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, तो लाखों फलस्तीनी शरण लेने के लिए जॉर्डन पहुंच सकते हैं, जिससे वहां आर्थिक और सामाजिक संकट गहरा जाएगा.
जॉर्डन ने यह भी आरोप लगाया है कि इजराइल की मौजूदा सरकार और कुछ दक्षिणपंथी नेता वेस्ट बैंक और यरूशलम में स्थायी बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं. हालांकि इजराइल का कहना है कि वह सभी धर्मों के लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना चाहता है और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है.
आखिर अल-अक्सा मस्जिद का विवाद क्या है?
अल-अक्सा मस्जिद पूर्वी यरूशलम में स्थित है और यह इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र धार्मिक स्थल माना जाता है. इसी परिसर में 'डोम ऑफ द रॉक' यानी कुब्बत अल-सखरा भी स्थित है. मुसलमानों का विश्वास है कि पैगंबर मोहम्मद मेराज की रात यहीं से स्वर्ग गए थे.
वहीं, यहूदियों के लिए यही स्थान 'टेंपल माउंट' के नाम से जाना जाता है. उनका मानना है कि प्राचीन काल में यहीं पहला और दूसरा यहूदी मंदिर था, जिसे बाद में नष्ट कर दिया गया. इसलिए यह स्थान यहूदी धर्म में भी अत्यंत पवित्र माना जाता है.
1967 के अरब-इजराइल युद्ध के बाद इजराइल ने पूर्वी यरूशलम पर कब्जा कर लिया, लेकिन अल-अक्सा मस्जिद परिसर का धार्मिक प्रबंधन जॉर्डन समर्थित 'इस्लामिक वक्फ' के पास ही रहने दिया गया. इसी व्यवस्था को 'स्टेटस क्वो' कहा जाता है. इसके तहत मुसलमानों को यहां नमाज अदा करने का अधिकार है, जबकि गैर-मुस्लिम, जिनमें यहूदी भी शामिल हैं, केवल निर्धारित समय पर परिसर में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन वहां सार्वजनिक रूप से धार्मिक प्रार्थना या अनुष्ठान नहीं कर सकते.
पिछले कुछ वर्षों में कई बार यहूदी समूहों के बड़े पैमाने पर परिसर में प्रवेश और धार्मिक अनुष्ठानों की घटनाओं ने इस व्यवस्था को लेकर विवाद बढ़ाया है. जॉर्डन और फलस्तीनी पक्ष का आरोप है कि इससे धीरे-धीरे स्टेटस क्वो बदलने की कोशिश हो रही है, जबकि इजराइल इन आरोपों से इनकार करता है.
यही कारण है कि अल-अक्सा मस्जिद केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इजराइल-फलस्तीन संघर्ष, यरूशलम की राजनीतिक स्थिति और पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा बन चुका है. ऐसे में इस परिसर में होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का असर क्षेत्रीय राजनीति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ता है.