Karnataka News: कर्नाटक में बीजेपी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद लिंबावली ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ विरोध के सुर छेड़ दिये हैं. उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी की आलोचना की है. लिंबावली ने कर्नाटक विधानसभा में पार्टी की प्रभावशीलता की आलोचना करते हुए कहा कि कर्नाटक विधानसभा में उनकी पार्टी अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह से विफल रही है.
प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बीच कोई सामंजस्य नहीं
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (RSS) के बेहद करीबी माने जाने वाले लिंबावली ने एक्स पर ट्वीट करते हुए MUDA घोटाला, विधानसभा में विपक्ष के नेता आर अशोका, वाल्मिकी विकास निगम घोटाला, गारंटी योजना के तहत एससी-एसटी के लिए आरक्षित अनुदान का दुरुपयोग जैसे कई मुद्दों को उठाया. उन्होंने कहा, "यह अफसोसजनक है कि हमारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र और विधानसभा में विपक्ष के नेता के बीच कोई सामंजस्य और समझ नहीं है."
The Monsoon session of the State Legislature has concluded. The BJP, which was supposed to be the voice of the people by pointing out the failures of state government has totally failed in doing it as an opposition party. Although they had an opportunity to uphold the…
— Aravind Limbavali (@ArvindLBJP) July 26, 2024
लोगों के मन में हमारे लिए सवाल पैदा हो गए हैं
उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी इनमें से किसी भी मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष तक नहीं ले जा सकी. उन्होंने इन मुद्दों को मजबूती के साथ न रखने को लेकर भी अपनी पार्टी की आलोचना की. उन्होंने कहा ऐसा न कर पाने से लोगों के मन में यह सवाल पैदा हो गया है क्या विपक्ष भी इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष के साथ मिला हुआ है.
पूरी तरह से विफल रही है बीजेपी
लिंबावली ने कहा, 'जो बीजेपी सत्ता की विफलताओं को उजागर कर जनता की आवाज बना करती थी वह विपक्ष के तौर पर ऐसा करने में पूरी तरह से विफल रही है.' पूर्व मंत्री ने कहा कि हमारे पास सरकार के घोटालों, अनियमितताओं को उजागर करने का अवसर था लेकिन बीजेपी के नेता इस अवसर को सदन में भुनाने में विफल रहे.
उन्होंने बेंगलुरू समेत कई जिलों में बढ़ते डेंगू के प्रकोप और भारी बारिश के बाद उत्पन्न हुए बाढ़ जैसे हालातों का भी मुद्दा उठाया, जिसके कारण लाखों परिवारों को बेघर होना पड़ा है. उन्होंने कहा, 'यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी पार्टी के नेताओं ने यह महसूस ही नहीं किया कि इन मुद्दों को भी उठाया जाना जाहिए और परेशानी से जूझ रहे लोगों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए.'