पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा हो रहा है जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था. विधानसभा चुनाव में हार और सत्ता से बाहर होने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है. पार्टी के अलग-अलग गुटों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है, जिसने अब एक बड़े संगठनात्मक बदलाव का रूप ले लिया है. सोमवार को कोलकाता में टीएमसी के बागी विधायकों की बैठक में ऐसा फैसला लिया गया जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी. बागी गुट ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. इसके बाद हर किसी की नजर इस बात पर टिक गई कि आखिर अरूप रॉय कौन हैं और उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई.
अरूप रॉय का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था. पश्चिम बंगाल के हावड़ा में जन्मे अरूप रॉय शुरुआती दौर में कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़े रहे. वर्ष 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब अरूप रॉय उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने शुरू से उनका साथ दिया. पार्टी के विस्तार और संगठन निर्माण में उनकी भूमिका को हमेशा महत्वपूर्ण माना गया.
अरूप रॉय को हावड़ा जिले की राजनीति का प्रभावशाली नेता माना जाता है. वह हावड़ा मध्य विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक चुने जा चुके हैं. वर्ष 2011, 2016, 2021 और 2026 के चुनावों में उन्होंने जीत दर्ज की. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकारों में उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं और उन्होंने कृषि विपणन तथा सहकारिता जैसे विभागों का कार्यभार संभाला.
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, अरूप रॉय की सबसे बड़ी ताकत उनकी संगठनात्मक क्षमता है. लंबे समय तक वह तृणमूल कांग्रेस के हावड़ा जिला अध्यक्ष रहे और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ बनाए रखी. स्थानीय स्तर पर विवाद सुलझाने और संगठन को एकजुट रखने की क्षमता के कारण उन्हें कई बार पार्टी का संकटमोचक भी कहा गया. उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद बनाए रखते हैं.
कोलकाता में हुई बैठक में बागी गुट ने नया संगठनात्मक ढांचा घोषित किया. अरूप रॉय को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, जबकि फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई. ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान और संदीपन साहा को महासचिव नियुक्त किया गया. बागी नेताओं का दावा है कि यह फैसला पार्टी संविधान के अनुरूप लिया गया है और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भी दी जाएगी. इस घटनाक्रम ने टीएमसी की अंदरूनी राजनीति को नई दिशा दे दी है.