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क्या AAP कर सकती है 'राइट टू रिकॉल' का इस्तेमाल? राघव चड्ढा के जाने के बाद गरमाया ये मुद्दा

राघव चड्ढा समेत कई सांसदों के AAP छोड़ने की खबरों के बीच राइट टू रिकॉल की चर्चा बढ़ी है. चलिए जानते हैं क्या होता है राइट टू रिकॉल प्रक्रिया.

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Km Jaya

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत कई अन्य सदस्यों के बीजेपी के साथ जुड़ने से एक बार फिर राइट टू रिकॉल की चर्चा तेज हो गई है. कई लोग जानना चाहते हैं कि क्या आम आदमी पार्टी ऐसे नेताओं को वापस ला सकती है या उन्हें पद से हटा सकती है. इसी सवाल के बीच राइट टू रिकॉल बिल को लेकर बहस शुरू हो गई है.

राइट टू रिकॉल एक प्रस्तावित लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो मतदाताओं को यह अधिकार देने की बात करती है कि वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा सकें. इसका सीधा मतलब यह है कि यदि जनता अपने सांसद, विधायक या स्थानीय प्रतिनिधि के काम से संतुष्ट नहीं है, तो उसे वापस बुलाने यानी पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.

क्या है इसका उद्देश्य?

हाल के दिनों में इस व्यवस्था की जोरदार वकालत खुद राघव चड्ढा ने भी की थी. इस अवधारणा का मूल उद्देश्य यही है कि जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान जनता के प्रति जवाबदेह बने रहें.

लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के संविधान में सांसदों और विधायकों के लिए राइट टू रिकॉल का कोई सीधा प्रावधान मौजूद नहीं है. यानी फिलहाल मतदाता किसी सांसद या विधायक को रिकॉल प्रक्रिया के जरिए सीधे नहीं हटा सकते. यह व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक लागू नहीं हुई है.

क्या होता है राइट टू रिकॉल?

जब कोई सांसद पार्टी बदलता है, तब मामला दलबदल विरोधी कानून के तहत आता है. जिसे कई लोग रिकॉल कह रहे हैं, वह असल में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता घोषित करने की प्रक्रिया होती है. यह कानून उन सांसदों और विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देता है, जो अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं.

ऐसे मामलों में फैसला संबंधित सदन के सभापति या स्पीकर द्वारा लिया जाता है. यानी यदि कोई सांसद पार्टी बदलता है, तो उसे तुरंत जनता नहीं हटाती, बल्कि दलबदल विरोधी कानून के तहत उसकी सदस्यता पर फैसला होता है.

कहां-कहां अभी है मौजूद?

हालांकि भारत में रिकॉल की अवधारणा पूरी तरह खत्म नहीं है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों जैसे सरपंच, पंचायत सदस्य और वार्ड सदस्यों के लिए रिकॉल का प्रावधान मौजूद है. वहां जनता उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

कब आया यह प्रस्ताव?

राइट टू रिकॉल का विचार नया नहीं है. भारत में इसका प्रस्ताव सबसे पहले 1944 में एम एन रॉय ने रखा था. बाद में जयप्रकाश नारायण और वरुण गांधी जैसे नेताओं ने भी निजी विधेयकों के जरिए इसे लागू करने की मांग उठाई लेकिन अब तक यह कानून नहीं बन सका.

फिलहाल AAP सीधे राइट टू रिकॉल के जरिए अपने सांसदों को वापस नहीं ला सकती, लेकिन दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई जरूर संभव है.