menu-icon
India Daily

मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे का विरोध, USCIRF ने की RSS को बैन करने की मांग

अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे से ठीक पहले संघ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है. गौरतलब है कि इस आयोग के अध्यक्ष पाकिस्तानी मूल के आसिफ महमूद हैं. 

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे का विरोध, USCIRF ने की RSS को बैन करने की मांग
Courtesy: X

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने विवाद खड़ा कर दिया है. आयोग ने अमेरिकी सरकार से मांग की है कि वह आरएसएस नेताओं को कोई राजनयिक शिष्टाचार या उच्चस्तरीय बैठक न दे. इसके बजाय, कथित धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन को लेकर संघ और उसके सदस्यों पर प्रतिबंध लगाए जाएं. 

 पाकिस्तानी मूल के अध्यक्ष पर उठे सवाल

इस समय USCIRF के प्रमुख पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक आसिफ महमूद हैं. महमूद पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से आते हैं और उनका पाकिस्तानी नेताओं तथा कूटनीतिक तंत्र से पुराना और गहरा संबंध रहा है. हिंदू-अमेरिकी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि एक स्वतंत्र आयोग के प्रमुख के रूप में महमूद का पाकिस्तान के राजनीतिक प्रतिष्ठान के साथ इतना घनिष्ठ संबंध उसकी तटस्थता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

कश्मीर पर लॉबिंग और भारत विरोधी रुख

आसिफ महमूद का इतिहास भारत विरोधी गतिविधियों और लॉबिंग से भरा रहा है. वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में जम्मू-कश्मीर को लेकर सुनवाई आयोजित कराने के लिए खुलकर लॉबिंग की थी और खुद गवाही भी दी थी. आयोग की कमान संभालने के बाद से उन्होंने भारत को "विशेष चिंता वाले देश" (CPC) की सूची में डालने, भारतीय खुफिया एजेंसी (R&AW) के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने और भारत को हथियारों की बिक्री पर समीक्षा करने की सिफारिशें की हैं.

एजेंडे के तहत उठाया गया कदम

आलोचकों का मानना है कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की यह नई मांग एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. एक तरफ जहां पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थानीय लोगों पर दमनकारी कार्रवाई जारी है, वहीं आयोग के प्रमुख भारत के खिलाफ पक्षपातपूर्ण अभियान चला रहे हैं. इसी वजह से विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि विशिष्ट कूटनीतिक और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित है.