menu-icon
India Daily

भारत ने UNSC में रखी मांग, नए स्थायी सदस्यों को भी मिले वीटो; जानें क्या है इसका मतलब

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के तहत सभी स्थायी सदस्यों को समान वीटो अधिकार देने की मांग की है. भारत का कहना है कि अगर नए स्थायी सदस्यों को वीटो से वंचित रखा गया, तो वे मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों की तुलना में 'सेकंड क्लास' सदस्य बन जाएंगे.

Km Jaya
Edited By: Km Jaya
भारत ने UNSC में रखी मांग, नए स्थायी सदस्यों को भी मिले वीटो; जानें क्या है इसका मतलब
Courtesy: @IndiaUNNewYork X Account

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में बड़े सुधार की मांग को और स्पष्ट करते हुए कहा है कि अगर नए स्थायी सदस्यों को वीटो पावर नहीं दी जाती है, तो उनकी स्थिति मौजूदा स्थायी सदस्यों से कमजोर रहेगी. भारत का कहना है कि जब तक वीटो की व्यवस्था मौजूद है, तब तक सुधार के बाद सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास समान वीटो अधिकार होने चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पार्वथनेनी ने सोमवार को वीटो के मुद्दे पर हुई अंतर-सरकारी वार्ता में भारत का पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि नए स्थायी सदस्यों का ऐसा अलग वर्ग बनाना, जिसके पास वीटो अधिकार न हो, सुरक्षा परिषद की मौजूदा निर्णय लेने की व्यवस्था में वास्तविक बदलाव नहीं करेगा. इससे नए सदस्य प्रभावी रूप से 'सेकंड क्लास' सदस्य बन जाएंगे, जबकि मौजूदा पांच शक्तियों का प्रभाव बना रहेगा.

भारत ने क्यों उठाई बराबर वीटो की मांग?

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और इसके विस्तार की मांग करता रहा है. नई दिल्ली का तर्क है कि दुनिया की मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के मुकाबले सुरक्षा परिषद की संरचना पुरानी हो चुकी है. भारत चाहता है कि उभरती वैश्विक शक्तियों और लंबे समय से कम प्रतिनिधित्व वाले देशों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित भूमिका मिले.

वर्तमान में सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य हैं. इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं और सभी के पास वीटो पावर है. बाकी 10 सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं और उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता. भारत का कहना है कि केवल गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से वास्तविक सुधार नहीं होगा. अगर नए स्थायी सदस्य बनाए जाते हैं, तो उन्हें भी समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए.

स्थायी सीट के लिए भारत की लंबी मुहिम

सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करना भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख लक्ष्य रहा है. नई दिल्ली का मानना है कि बदलती वैश्विक शक्ति संरचना में भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश को संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था में स्थायी भूमिका मिलनी चाहिए. भारत इससे पहले 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रहा था. यह उसका आठवां कार्यकाल था. इससे पहले भारत 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में परिषद का सदस्य रह चुका है.

2028-29 की सीट पर भी भारत की नजर

भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सीट भी हासिल करना चाहता है. इसके लिए एशिया-प्रशांत समूह की एक सीट पर भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होना है. चुनाव जून 2027 में निर्धारित हैं. हालांकि, भारत का मुख्य लक्ष्य स्थायी सदस्यता हासिल करना है. नई दिल्ली मानती है कि केवल दो साल की गैर-स्थायी सदस्यता उसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव और जिम्मेदारियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं है.

बराबर वीटो का मतलब क्या है?

भारत की मांग का मतलब साफ है. अगर भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है और नए स्थायी सदस्य जोड़े जाते हैं, तो उन्हें मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों के बराबर अधिकार दिए जाएं. भारत के अनुसार, वीटो व्यवस्था को बनाए रखते हुए नए स्थायी सदस्यों को इस अधिकार से बाहर रखना परिषद में एक नई असमानता पैदा करेगा.

नई दिल्ली का मानना है कि स्थायी सदस्यता केवल एक पद या प्रतीकात्मक दर्जा नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके साथ समान अधिकार और जिम्मेदारियां भी जुड़ी होनी चाहिए. भारत ने इस रुख को BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा में भी सामने रखा था.

UNSC में सुधार क्यों जरूरी माना जा रहा है?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थापना 1945 में हुई थी. तब से दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है. कई नए देश वैश्विक शक्ति के रूप में उभरे हैं, लेकिन परिषद की स्थायी सदस्यता अभी भी पांच देशों तक सीमित है. भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद को आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए. इसी वजह से भारत स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की वकालत कर रहा है.

भारत के लिए वीटो का मुद्दा केवल शक्ति का सवाल नहीं है. यह समानता, प्रतिनिधित्व और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उचित भागीदारी से जुड़ा मामला है. नई दिल्ली चाहती है कि भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होने पर नए स्थायी सदस्यों को भी मौजूदा पांच शक्तियों के समान अधिकार मिलें.