भारत और चीन ने छह साल बाद लिपुलेख दर्रा से व्यापार दोबारा शुरू करने का फैसला किया है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति फिर चर्चा में आ गई है. जहां भारत इसे पुराने व्यापार मार्गों को बहाल करने का कदम मानता है, वहीं नेपाल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है. काठमांडू का कहना है कि यह इलाका उसके दावे वाले क्षेत्र में आता है. इस फैसले ने तीनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को फिर सामने ला दिया है.
यह विवाद कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा क्षेत्र से जुड़ा है, जो भारत, चीन और नेपाल का त्रि-जंक्शन माना जाता है. भारत इस इलाके को अपने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा मानता है, जबकि नेपाल इसे अपने दार्चुला जिले में शामिल बताता है. 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल अपनी दावेदारी रखता है, जिससे यह मामला संवेदनशील बन गया है.
विवाद का मुख्य कारण काली नदी की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग दावे हैं. नेपाल का कहना है कि नदी की शुरुआत लिम्पियाधुरा से होती है, जिससे लिपुलेख उसका हिस्सा बनता है. वहीं भारत मानता है कि नदी कालापानी के पास से शुरू होती है. यही तकनीकी अंतर राजनीतिक विवाद में बदल गया है और कई दौर की बातचीत के बावजूद अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है.
तनाव 2020 में तब बढ़ गया जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक सड़क का उद्घाटन किया. नेपाल ने इसके जवाब में नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें इस पूरे क्षेत्र को अपना बताया गया. भारत ने इस कदम को गलत बताया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान केवल बातचीत से ही संभव है. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में खिंचाव साफ नजर आया.
अब जब भारत और चीन व्यापार फिर शुरू कर रहे हैं, नेपाल को संप्रभुता का मुद्दा दिख रहा है. उसका मानना है कि इस तरह के कदम उसके दावे को नजरअंदाज करते हैं. भारत इसे पुराने समझौते की निरंतरता मानता है और साथ ही कहता है कि सीमा विवाद बातचीत से सुलझाया जाएगा. इस बीच, यह मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती लोगों की आजीविका के लिए भी बेहद अहम माना जाता है.