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अंग्रेजों की नाक के नीचे चल रहा था महिलाओं का सीक्रेट मिशन, कैसे क्रांतिकारियों तक पहुंचती थी ब्रिटिश हुकूमत की हर खबर?

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई महिलाओं ने गुप्त संदेश पहुंचाने, क्रांतिकारियों को सुरक्षित ठिकाने दिलाने और अंग्रेजी गतिविधियों की जानकारी साझा करने जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जिनकी कहानी बहुत कम कही और सुनी गई है.

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Kanhaiya Kumar Jha

जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है तो सबसे पहले भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान सेनानियों के नाम याद आते हैं. लेकिन आजादी की इस लड़ाई का एक ऐसा पक्ष भी है, जिसके बारे में बहुत कम चर्चा होती है. यह उन महिलाओं की कहानी है जिन्होंने अपनी पहचान छिपाकर क्रांतिकारियों की मदद की, गुप्त संदेश पहुंचाए और कई बार अंग्रेजी प्रशासन की गतिविधियों की जानकारी भी स्वतंत्रता सेनानियों तक पहुंचाई.

इन महिलाओं ने किसी सरकारी खुफिया एजेंसी की तरह काम नहीं किया था, लेकिन जिस तरह उन्होंने जोखिम उठाकर गोपनीय सूचनाएं और संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाए, उसे स्वतंत्रता आंदोलन के गुप्त नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.

अंग्रेजों को क्यों नहीं होता था महिलाओं पर शक?

ब्रिटिश शासन के दौरान आम धारणा यह थी कि महिलाएं राजनीति और क्रांतिकारी गतिविधियों से दूर रहती हैं. इसी सोच का फायदा कई क्रांतिकारी संगठनों ने उठाया. महिलाएं सामान्य गृहिणी, रिश्तेदार, तीर्थयात्री, दूध बेचने वाली, सब्जी बेचने वाली या घरेलू कामकाज करने वाली महिला के रूप में आसानी से यात्रा कर लेती थीं. अंग्रेज अधिकारियों को अक्सर उन पर संदेह नहीं होता था.


इसी वजह से कई बार महत्वपूर्ण संदेश, दस्तावेज और छोटी-छोटी सूचनाएं सुरक्षित तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती थीं.

क्रांतिकारियों तक कैसे पहुंचती थी गुप्त जानकारी?

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अलग-अलग क्रांतिकारी संगठनों के अपने गुप्त संपर्क तंत्र थे. इन नेटवर्क में शामिल कुछ महिलाएं पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखती थीं. यदि किसी इलाके में छापेमारी की तैयारी होती या किसी क्रांतिकारी की गिरफ्तारी की योजना बनती, तो उपलब्ध जानकारी तुरंत संबंधित साथियों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती थी.

गुप्त संदेश पहुंचाने के लिए कई तरीके अपनाए जाते थे. कभी संदेश कपड़ों के बीच छिपाए जाते, कभी किताबों या घरेलू सामान में रखे जाते और कई बार भरोसेमंद व्यक्ति के जरिए मौखिक रूप से सूचना पहुंचाई जाती थी. यही सावधानी कई क्रांतिकारियों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का अवसर देती थी.

दुर्गा भाभी का साहस आज भी मिसाल है

स्वतंत्रता आंदोलन में दुर्गा देवी वोहरा, जिन्हें देश दुर्गा भाभी के नाम से जानता है, का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है. वर्ष 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद हुए घटनाक्रम के दौरान भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित निकालने की योजना बनाई गई. इस मिशन में दुर्गा भाभी ने भगत सिंह की पत्नी का रूप धारण किया, जबकि उनके छोटे बेटे भी उनके साथ थे. इस रणनीति की वजह से भगत सिंह अंग्रेजों की नजरों से बचकर निकलने में सफल रहे. भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में इसे सबसे साहसी गुप्त अभियानों में गिना जाता है.

सुशीला दीदी और कल्पना दत्त ने भी निभाई अहम भूमिका

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ी सुशीला दीदी ने गुप्त संदेश पहुंचाने, क्रांतिकारियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने और संगठन के बीच संपर्क बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वहीं चटगांव शस्त्रागार कांड से जुड़ी क्रांतिकारी कल्पना दत्त ने भी भूमिगत गतिविधियों, गुप्त बैठकों और संगठन के समन्वय में सक्रिय योगदान दिया. इसी तरह प्रीतिलता वाडेदार ने भी क्रांतिकारी अभियानों की तैयारी और संचालन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

क्या इन्हें जासूस कहना सही होगा?

इतिहासकार आम तौर पर इन महिलाओं को आधुनिक अर्थों में "जासूस" नहीं कहते, क्योंकि वे किसी औपचारिक खुफिया एजेंसी का हिस्सा नहीं थीं. हालांकि उन्होंने गुप्त संदेश पहुंचाने, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने और क्रांतिकारियों को समय पर चेतावनी देने जैसे कार्य किए. इसलिए उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के गुप्त नेटवर्क की महत्वपूर्ण सहयोगी कहना अधिक सटीक माना जाता है.

इतिहास के इस अध्याय को जानना क्यों जरूरी है?

भारत की आजादी केवल मैदान में लड़ी गई लड़ाइयों का परिणाम नहीं थी. इसके पीछे हजारों ऐसे गुमनाम लोग भी थे, जिन्होंने बिना किसी पहचान या सम्मान की इच्छा के देश के लिए जोखिम उठाया. इनमें महिलाओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी. उन्होंने अपनी सूझबूझ, साहस और गोपनीयता के बल पर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी.

आज जब देश अपनी आजादी के इतिहास को नए नजरिए से समझने की कोशिश कर रहा है, तब इन कम चर्चित महिला सहयोगियों की कहानी भी सामने आनी चाहिए. यह केवल इतिहास का एक अनसुना अध्याय नहीं, बल्कि उस साहस की मिसाल है जिसने आजादी की लड़ाई को भीतर से मजबूत बनाया.