नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत में आज से एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील सुनवाई शुरू हो रही है. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर 2018 के फैसले के पुनर्विचार के साथ-साथ अन्य धर्मों में महिलाओं से जुड़े कई लंबित मुद्दों पर नौ न्यायाधीशों की बड़ी पीठ विचार करेगी. पिछले 26 साल से अदालतों में घूम रहे इन मामलों का फैसला लैंगिक समानता और धार्मिक आस्था के बीच का रास्ता तय कर सकता है. सुनवाई 7 अप्रैल सुबह 10:30 बजे से शुरू होकर 22 अप्रैल तक चलेगी. सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस तरह की 50 से अधिक लंबित याचिकाओं पर सुनवाई करेगी.
केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश अभी भी वर्जित है. मंदिर की परंपरा के अनुसार भगवान अय्यप्पा ब्रह्मचारी हैं और मासिक धर्म वाली महिलाओं को अपवित्र माना जाता है. 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4-1 के बहुमत से यह प्रतिबंध असंवैधानिक बताते हुए सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी. इसके बाद बड़े विरोध प्रदर्शन हुए और दो महिलाएं मंदिर में प्रवेश भी कर चुकी हैं.
इस सुनवाई में मुख्य रूप से पांच बड़े मुद्दे शामिल हैं. पहला सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश, दूसरा मस्जिदों में महिलाओं का नमाज पढ़ने का अधिकार, तीसरा दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति (खतना), चौथा गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोकना और पांचवां मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में लिंग भेदभाव. ये सभी मामले धार्मिक प्रथाओं और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव को उठाते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं और समर्थकों को 7 से 9 अप्रैल तक सुनवाई का मौका मिलेगा. विरोध करने वालों को 14 से 16 अप्रैल तक अवसर दिया जाएगा. सुनवाई कुल आठ दिनों तक चलेगी. पीठ अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 (समानता) के बीच संतुलन पर गौर करेगी. यह फैसला भविष्य में धार्मिक मामलों में अदालती हस्तक्षेप की सीमाएं भी तय कर सकता है.
केंद्र सरकार ने पहले 2018 के फैसले का समर्थन किया था लेकिन बाद में संतुलित रुख अपनाया. अखिल भारतीय संत समिति ने कहा कि अदालत को केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के मामलों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए. अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने की अपील की. जैन समुदाय का कहना है कि धार्मिक रीति-रिवाज तय करने का अधिकार धर्म के अनुयायियों का है.
यह सुनवाई सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है. यह तय करेगी कि क्या अदालतें धार्मिक प्रथाओं को समानता के आधार पर परख सकती हैं. अगर 2018 का फैसला बरकरार रहा तो अन्य धर्मों में भी महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ सकता है. देश भर में इस सुनवाई पर नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि इसका फैसला लैंगिक न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता के भविष्य को आकार देगा.