नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अरावली पर्वतमाला को लेकर सख्त रुख अपनाया. अदालत ने साफ कहा कि जब तक अरावली रेंज की स्पष्ट और वैज्ञानिक परिभाषा तय नहीं हो जाती, तब तक किसी को भी इस क्षेत्र में किसी तरह की छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
कोर्ट ने हरियाणा सरकार को प्रस्तावित जंगल सफारी परियोजना से जुड़ी विस्तृत योजना (डीपीआर) फिलहाल जमा करने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि वे इस मामले में तभी आगे बढ़ेंगे जब अरावली रेंज से जुड़े मुख्य मुद्दे पर पहले स्पष्ट निर्णय हो जाएगा. अदालत ने कहा कि वह विशेषज्ञ नहीं है, इसलिए अरावली की सही सीमा और परिभाषा तय करने का काम विशेषज्ञों पर छोड़ना जरूरी है. जब तक विशेषज्ञ समिति अपनी राय नहीं दे देती, तब तक किसी भी परियोजना पर विचार करना उचित नहीं होगा.
हरियाणा सरकार की ओर से पेश वकील ने बताया कि राज्य सरकार ने पहले 10,000 एकड़ में प्रस्तावित सफारी प्रोजेक्ट का दायरा घटाकर 3,300 एकड़ कर दिया है. उनका कहना था कि सरकार केवल इतनी अनुमति चाहती है कि वह अपनी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) को जांच के लिए दे सके. लेकिन अदालत ने कहा कि सफारी प्रोजेक्ट के मुद्दे को मुख्य मामले के साथ ही देखा जाएगा.
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि कई बार केंद्रीय अधिकार प्राप्त समितियां अनुमति देने में चयनात्मक रवैया अपनाती हैं. अदालत ने संकेत दिया कि यदि बिना स्पष्ट परिभाषा के अनुमति दी गई तो परियोजना को आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जबकि वास्तविक स्थिति अलग हो सकती है. मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अरावली केवल हरियाणा या राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई राज्यों से होकर गुजरने वाली एक महत्वपूर्ण पर्वतमाला है.
गौरतलब है कि पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की मेगा 'अरावली जू सफारी प्रोजेक्ट' पर रोक लगा दी थी. इस परियोजना को दुनिया का सबसे बड़ा जू-सफारी बताया जा रहा था. योजना के तहत गुरुग्राम और नूंह जिलों में फैले लगभग 10,000 एकड़ क्षेत्र में बाघ, जगुआर और तेंदुए के लिए अलग-अलग जोन बनाने और कई तरह के पक्षियों, सरीसृपों व तितलियों को बसाने का प्रस्ताव था.
इस मामले में पांच रिटायर्ड इंडियन फॉरेस्ट सर्विस ऑफिसर और 'पीपल फॉर अरावली नामक संस्था ने याचिका दायर की थी. उनका आरोप था कि यह परियोजना पहले से ही पर्यावरणीय दबाव झेल रही अरावली पर्वतमाला को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती है. सुप्रीम कोर्ट अब विशेषज्ञों की राय आने के बाद ही इस पर आगे निर्णय करेगा.