सुप्रीम कोर्ट की ओर से आज यानी 27 मई को SIR से जुड़ा एक बड़ा फैसला सुनाया गया है. अदालत द्वारा यह फैसला उस मामले में सुनाया गया है, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को चुनौती दी गई थी. अदालत की ओर से यह साफ कहा गया है कि चुनाव आयोग के पास SIR का अधिकार है.
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने इस मामले पर 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था. जिसे आज सुनाया गया. अदालत की ओर से कहा गया कि निर्वाचन आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत व्यापक शक्तियां हैं. इन शक्तियों को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और इसके नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिए.
अदालत की ओर से साफ कहा गया कि SIR करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र के अंदर आता है. यह प्रक्रिया कानूनी रूप से सही है और आयोग ने अपनी शक्तियों का उल्लंघन नहीं किया है. कई याचिकाओं में दावा किया गया था कि आयोग के पास इतने बड़े पैमाने पर SIR करने का अधिकार नहीं है और यह अनुच्छेद 326 तथा संबंधित कानूनों का उल्लंघन है.
इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का अभिन्न अंग है. इसके अलावा चुनाव आयोग को अगर किसी व्यक्ति के दस्तावेजों में नागरिकता पर संदेह हो तो आयोग उसका नाम हटाने की कार्रवाई कर सकता है. अदालत की ओर से कहा गया कि SIR में मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने, आपत्तियां दर्ज कराने और अपील करने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के सवालों पर स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता, बल्कि संदिग्ध मामलों को केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी को भेजता है, जिसे चार हफ्तों में जवाब देना होता है. अदालत ने साफ कहा कि इन तर्कों के साथ SIR को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है.
बिहार में SIR की प्रक्रिया पहले चरण में पूरी की गई थी. अधिसूचना के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की पुरानी सूचियों में नहीं थे, उन्हें पैतृक संबंध साबित करना आवश्यक था. आंकड़ों के मुताबिक, इस अभियान में मतदाता सूची के मसौदे से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे. जिसके बाद यह मामला अदालत में पहुंचा था.