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'कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद...', कैसे इन दिनों बन-बिगड़ रहे हैं RSS-BJP के रिश्ते?

राष्ट्रीय स्यवं सेवक संघ से 4 दशक से जुड़े पूर्व खंड कार्यवाह कृष्ण दत्त शुक्ल बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी, संघ पर आश्रित है, संघ बीजेपी पर आश्रित नहीं है. संघ, हमेशा, अपने अनुषांगिक संगठनों को अभिभावक की नजर से देखता है. अगर कुछ गलत होता है तो संघ टोकता है. यह समय बीजेपी से अनबन का नहीं है, उन्हें वास्तविकता का एहसास कराना है.

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Abhishek Shukla

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच तल्खियां, अब सार्वजनिक मंचों पर सामने आ रही हैं. संघ के नेता बड़े मंचों से साफ कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी का खराब प्रदर्शन कुछ और नहीं अहंकार का नतीजा है. राम अहंकार तोड़ते हैं, नेतृत्व को यह अहंकार था कि वे ही सबकुछ कर रहे हैं तो उनका अहंकार टूट गया. संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार तक, बीजेपी को नसीहतें दे रहे हैं कि अहंकार छोड़िए. 

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बीच चुनाव में कुछ ऐसा कहा था जिसके बाद से ही ये तल्खियां सार्वजनिक हो गईं. उन्होंने कहा था, 'शुरू में हम अक्षम होंगे. थोड़ा कम होंगे. तब संघ की जरूरत पड़ती थी. आज हम बढ़ गए हैं और सक्षम हैं तो भाजपा अपने आप को चलाती है.' जेपी नड्डा के इस बयान का संकेत बेहद गलत गया. अर्थ यह लगाया गया कि बीजेपी, संघ को दरकिनरा कर रही है, उसे अपने कैडर पर भरोसा है, वे ही चुनावी नैया पार करा लेंगे. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जाना लगा कि संघ और बीजेपी के बीच दूरियां ऐसे में बढ़ने लगीं. पर क्या सच में ऐसा है? 

इस सवाल के जवाब में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से 4 दशकों से जुड़े कार्यकर्ता आचार्य कृष्ण दत्त शुक्ल कहते हैं, 'संघ की जरूरत बीजेपी को हमेशा पड़ेगी. संघ को नाराज करके बीजेपी अपना मंत्रिमंडल तक तय नहीं कर पाती है. संघ दखल नहीं देता लेकिन बीजेपी को पता है कि औपचारिकताएं क्या हैं. संघ के बिना बीजेपी का अस्तित्व नहीं है. बीजेपी की हिंदुत्ववादी नीतियां, एक ध्वज और एक संविधान की नीतियां, राष्ट्रवाद, सब संघ की देन है. बीजेपी कभी इतनी सक्षम नहीं है कि बिना संघ के आशीर्वाद के स्थापित हो सके. बीजेपी की भूमिका संघ के अनुषांगिक संगठन की है, वही रहेगी.'

कभी नीम, कभी शहद, ये कैसे हुए बीजेपी-संघ के रिश्ते?

सर संघ संचालक मोहन भागवत और कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार ने हाल ही में कुछ ऐसा कहा है, जिसके बाद ही सवाल उठने लगे कि अब संघ, बीजेपी के नेतृत्व से नाराज है. संघ प्रमुख ने कहा था, 'जो मर्यादा का पालन करते हुए काम करता है, गर्व करता है, लेकिन अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है.' 

संघ और बीजेपी की राजनीति पर नजर रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आनंद मिश्र बताते हैं संघ का स्पष्ट इशारा बीजेपी नेताओं को नसीहत देने का था. पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद मोदी-मोदी का नारा दिया था, जेपी नड्डा से लेकर अमित शाह तक 'मैं' की भावना संघ को खटक रही थी. नतीजे आए तो इसी मैं और अहंकार की भावना पर संघ ने नसीहत दी है.

ऑर्गेनाइजर के एक लेख में संघ सदस्य रतन शारदा ने लिखा था कि बीजेपी नेता जनता की आवाज सुनने की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैन फॉलोइंग की चमक का आनंद ले रहे थे. यही बीजेपी के खिलाफ गया.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा, 'जिन्होंने राम का विरोध किया, उन्हें राम ने बिल्कुल भी शक्ति नहीं दी. जिस पार्टी ने भक्ति की,अहंकार आया, उस पार्टी को 241 पर रोक दिया, पर सबसे बड़ी बना दिया.' इन बयानों की वजह से कहा जा रहा है कि संघ और बीजेपी में सब ठीक नहीं है.

क्या सच में बीजेपी और संघ में ठनी है?

संघ के पूर्व खंड कार्यवाह कृष्ण दत्त शुक्ल बताते हैं संगठन और पार्टी की कभी ठनती नहीं है. न संघ के नेता नाराज हैं, न ही बीजेपी से वे दूर हैं. संघ की भूमिका, बीजेपी के लिए अभिभावक की है, गुरु की है. अगर शीर्ष पर बैठे लोग सत्य नहीं बोलेंगे तो लोग निरंकुश होंगे. संघ की सबसे बड़ी ताकत, अनुशासन है, जिसके टूटने पर फटकारना संघ का अधिकार है. 

आचार्य कृष्ण दत्त ने रामचरित मानस की गोस्वामी तुलसी दास की चौपाई का जिक्र करते हुए कहा, 'सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास.' उन्होंने कहा कि संघ गुरु की भूमिका है, वह बीजेपी की दिशा दे रहा है, अपने राजधर्म का पालन कर रहा है. अगर जनता ने प्रतिनिधित्व दिया है तो उनके लिए काम करें. जनता के पास सेवक भाव से जाएं. अगर ऐसा नहीं होगा तो फटकार पड़गी. अनुषांगिक संगठनों को मूल संगठनों से दिशा-निर्देश मिलेगा ही.

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेता कर रहे संघ की अनदेखी?

इस सवाल के जवाब में संघ के पूर्व पदाधिकारी कृष्ण दत्त बताते हैं कि 22 जनवरी को अयोध्या में जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, तब नरेंद्र मोदी के साथ गर्भ गृह में सर संघ संचालक मोहन भागवत गए थे. पीएम मोदी ने उन्हें अभिभावक की तरह आगे रखा था. योगी आदित्यनाथ शनिवार को संघ प्रमुख से मुलाकात करने वाले हैं. सिर्फ जेपी नड्डा का बयान आपत्तिजनक है, जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा है. संगठन से उन्हें एक तरह से हटा दिया गया है, अब वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में हैं, पार्टी प्रमुख नहीं रहेंगे. बीजेपी में संगठन अहम है, मंत्रिपद या कैबिनेट नहीं. उन्हें छोड़कर किसी भी नेता का ऐसा बयान नहीं आया, जो इस ओर इशारा करता हो कि बीजेपी ने संघ की अवज्ञा की हो.

...क्या महज अनुशासनिक सीख है संघ का गुस्सा?

संघ सेवक अशोक कुमार पांडेय बताते हैं कि अनुशासन, संघ की नींव है. अगर अनुशासन टूटेगा तो सर संघ संचालक, संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी बताएंगे कि त्रुटियां कहां हो रही हैं. यही उनका काम है. सनातन, राम मंदिर, राष्ट्रवाद और जनसेवा के बीच अगर अहंकार की झलक दिखेगी तो संघठन का मूल संकल्प प्रभावित होगा. संघ के नेता, अनुशासन बिगड़ते नहीं देख सकते. वे सत्ता में कौन है, इस पर विचार नहीं करते, उन्हें जो कहना है, वे स्पष्ट तौर पर कहते हैं. यही दशकों से उनके प्रसांगिक रहने की वजह भी है.