आजादी के बाद जब भारत में पहला आम चुनाव हुआ, तब जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. राजनीतिक गलियारों में लगभग तय माना जा रहा था कि देश की पहली निर्वाचित सरकार कांग्रेस ही बनाएगी. लेकिन चुनावी नतीजों ने एक दूसरी कहानी भी लिखी.
कांग्रेस ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की, लेकिन उसके सामने विपक्ष पूरी तरह गायब नहीं था. कम्युनिस्ट, समाजवादी, कांग्रेस से अलग हुए नेता और नवगठित जनसंघ जैसे दल मैदान में थे. सवाल यह है कि आखिर शुरुआती लोकसभा चुनावों में नेहरू और कांग्रेस को सबसे ज्यादा चुनौती किसने दी थी?इसका जवाब चुनावी आंकड़ों में थोड़ा दिलचस्प है.
लोकसभा सीटों के लिहाज से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनकर उभरी, जबकि वोट प्रतिशत के मामले में सोशलिस्ट पार्टी विपक्षी दलों में आगे थी. यही शुरुआती भारतीय लोकतंत्र की सबसे रोचक राजनीतिक कहानी थी.
भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ. यह सिर्फ एक चुनाव नहीं था, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयोगों में से एक था. निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पहले आम चुनाव में लोकसभा की 489 सीटों और हजारों विधानसभा सीटों के लिए मतदान कराया गया. करोड़ों भारतीय पहली बार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने.
जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस देश की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत थी. आजादी के आंदोलन से मिली विरासत, देशभर में फैला संगठन और नेहरू की व्यक्तिगत लोकप्रियता कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत थी.
लेकिन चुनावी मैदान में कांग्रेस अकेली नहीं थी. उसके सामने सोशलिस्ट पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा और कई अन्य राजनीतिक दल मौजूद थे.
पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लगभग 45 प्रतिशत वोट मिले और उसने 364 सीटें जीत लीं. यह एक बड़ी जीत थी. लेकिन आंकड़ों का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण था.
कांग्रेस को देश के सभी वोट नहीं मिले थे. विपक्षी वोट कई अलग-अलग दलों में बंट गए थे. यही वजह थी कि लगभग 45 प्रतिशत वोट शेयर के बावजूद कांग्रेस को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिल गया. यहीं से कांग्रेस के सामने विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आई- वह बिखरा हुआ था. कई दल कांग्रेस के खिलाफ लड़ रहे थे, लेकिन कोई एक राष्ट्रीय विपक्षी मंच नहीं था.
अगर केवल लोकसभा सीटों को देखा जाए तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. CPI ने 16 सीटें जीतीं. सोशलिस्ट पार्टी को 12 सीटें मिलीं. किसान मजदूर प्रजा पार्टी को 9 सीटें मिलीं. भारतीय जनसंघ को सिर्फ 3 सीटें मिलीं. यानी संसद के भीतर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा विपक्षी समूह कम्युनिस्टों का था.
यह CPI के लिए भी बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि चुनाव से पहले पार्टी एक कठिन राजनीतिक दौर से गुजर चुकी थी. आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में कम्युनिस्ट आंदोलन और सरकार के बीच गंभीर टकराव हुआ था. इसके बावजूद पार्टी ने चुनावी राजनीति में वापसी की और उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वोट प्रतिशत में सोशलिस्ट पार्टी आगे थी
यहीं कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ आता है. सीटों के मामले में CPI आगे थी, लेकिन विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत सोशलिस्ट पार्टी को मिला. सोशलिस्ट पार्टी को करीब 10.59 प्रतिशत वोट मिले, जबकि CPI का वोट शेयर लगभग 3.29 प्रतिशत था.
इसका जवाब भारत की चुनाव प्रणाली में छिपा है. भारत में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट व्यवस्था लागू थी और आज भी लागू है. इसमें पूरे देश का वोट प्रतिशत सीटों की संख्या तय नहीं करता. किसी उम्मीदवार को अपनी सीट पर सबसे ज्यादा वोट मिलने चाहिए. CPI का समर्थन कुछ इलाकों में ज्यादा केंद्रित था. वहीं सोशलिस्ट पार्टी को कई क्षेत्रों में वोट मिले, लेकिन वे पर्याप्त सीटों में जीत में नहीं बदल सके.
इसलिए पहले चुनाव की सबसे सटीक तस्वीर यह है कि CPI संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी, जबकि सोशलिस्ट पार्टी को विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा वोट मिले.
सोशलिस्ट पार्टी की चुनौती सिर्फ चुनावी नहीं थी. उसके कई नेता स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस की राजनीति से जुड़े रहे थे. जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं की राष्ट्रीय पहचान थी. समाजवादियों का आरोप था कि आजादी के बाद कांग्रेस गरीबों, किसानों और मजदूरों से किए गए अपने वादों को पूरा नहीं कर रही है. यानी कांग्रेस को चुनौती देने वाले सिर्फ उसके पुराने राजनीतिक विरोधी नहीं थे. कांग्रेस से अलग हुए लोग भी अब उसके खिलाफ मैदान में थे.
किसान मजदूर प्रजा पार्टी के नेता जे.बी. कृपलानी भी कांग्रेस से अलग होकर चुनावी राजनीति में उतरे थे. इन दलों ने गरीबों और किसानों के मुद्दों को कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाया. नेहरू के लिए यह चुनौती इसलिए अलग थी क्योंकि आलोचना उसी राजनीतिक जमीन से आ रही थी, जहां से कांग्रेस खुद निकली थी.
CPI ने नेहरू सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों पर ज्यादा तीखा हमला किया. कम्युनिस्ट पार्टी का मानना था कि आजादी के बाद भी देश की सत्ता व्यवस्था आम मजदूरों और किसानों के हितों के अनुरूप नहीं बदली है. पार्टी ने नेहरू सरकार की विदेश नीति और आर्थिक नीतियों की भी आलोचना की.
1952 के चुनाव में CPI का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा और वह लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में सामने आई. यह शुरुआती भारतीय राजनीति में वामपंथ के प्रभाव का बड़ा संकेत था.
1952 के चुनाव के बाद जवाहरलाल नेहरू ने चुनावी नतीजों और राजनीतिक दलों का अपना आकलन किया था. उन्होंने राजनीतिक दलों को अलग-अलग समूहों में बांटकर देखा. उनके अनुसार सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और अन्य वामपंथी दल एक अलग राजनीतिक धारा थे, जबकि सांप्रदायिक दलों और अन्य समूहों की राजनीतिक स्थिति अलग थी. नेहरू ने अपने चुनाव बाद के आकलन में सोशलिस्ट पार्टी के प्रदर्शन को काफी कमजोर माना था.
इससे एक बात साफ होती है कि नेहरू विपक्ष को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे. वह समझ रहे थे कि आजादी के बाद भारत में कई अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं अपनी जगह बना रही हैं. जनसंघ उस समय आज जैसी बड़ी ताकत नहीं था आज भारतीय राजनीति में भाजपा सबसे बड़ी राष्ट्रीय राजनीतिक शक्तियों में से एक है. लेकिन 1951-52 की तस्वीर बिल्कुल अलग थी.
भारतीय जनसंघ का गठन 1951 में हुआ था और वह अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत कर रहा था. पहले आम चुनाव में जनसंघ को सिर्फ 3 सीटें मिलीं. इसलिए यह कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा कि शुरुआती चुनावों में नेहरू की सबसे बड़ी चुनावी चुनौती जनसंघ था. उस दौर में कांग्रेस के सामने चुनावी और वैचारिक चुनौती मुख्य रूप से कम्युनिस्ट और समाजवादी राजनीति से आ रही थी.
पहले चुनाव के बाद यह साफ हो गया था कि विपक्ष खत्म नहीं होने वाला. 1957 के दूसरे आम चुनाव तक कांग्रेस देश की सबसे बड़ी ताकत बनी रही, लेकिन CPI और अन्य विपक्षी दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे थे. इसी वर्ष केरल में ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनी. यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की बेहद महत्वपूर्ण घटना थी. अब विपक्ष सिर्फ लोकसभा में सरकार से सवाल पूछने वाला समूह नहीं था. वह चुनाव जीतकर सरकार भी बना सकता था.
यही वह दौर था जब नेहरू और कांग्रेस के सामने यह साफ होने लगा कि भारत की राजनीति धीरे-धीरे एकदलीय प्रभुत्व से बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की तरफ बढ़ रही है.
अगर सवाल किसी एक व्यक्ति के बारे में है, तो शुरुआती लोकसभा चुनावों में नेहरू को ऐसा कोई एक प्रतिद्वंद्वी नहीं मिला, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता को सीधी चुनौती दे दी हो, लेकिन अगर सवाल राजनीतिक दलों की चुनौती का है, तो जवाब दो हिस्सों में बंटता है. संसद में सबसे बड़ी विपक्षी चुनौती CPI थी.
वोट प्रतिशत के लिहाज से सोशलिस्ट पार्टी विपक्षी दलों में ज्यादा मजबूत थी. और सबसे बड़ी बात यह थी कि कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ था. यही बिखराव ने नेहरू की कांग्रेस को मजबूत बनाया.
1951-52 के चुनाव ने नेहरू को भारत का पहला निर्वाचित प्रधानमंत्री बनाया और कांग्रेस को देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी, लेकिन इसी चुनाव ने भारतीय लोकतंत्र के लिए एक और कहानी लिखी.
विपक्ष छोटा था, लेकिन मौजूद था.
कमजोर था, लेकिन उसके पास विचारधारा थी.
बिखरा हुआ था, लेकिन उसके भीतर भविष्य की राजनीति छिपी हुई थी.
कम्युनिस्ट आगे बढ़े.
समाजवादी राजनीति ने देश को बड़े नेता दिए.
जनसंघ ने धीरे-धीरे अपना विस्तार किया.
क्षेत्रीय दल बाद के दशकों में और मजबूत होते गए.
इसलिए शुरुआती चुनावों की असली कहानी सिर्फ नेहरू की जीत नहीं है.
यह उस विपक्ष की कहानी भी है, जो संख्या में छोटा था लेकिन आने वाले दशकों में भारत की राजनीति को पूरी तरह बदलने वाला था.