menu-icon
India Daily

सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बड़ी फजीहत! उठाना पड़ रहा भारत की मध्यस्थता का भी खर्च

भारत के मध्यस्थता से अलग रहने के बाद सिंधु जल संधि विवाद में पाकिस्तान को अपना ही नहीं, भारत का खर्च भी उठाना पड़ रहा है. विवाद किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से जुड़ा है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बड़ी फजीहत! उठाना पड़ रहा भारत की मध्यस्थता का भी खर्च
Courtesy: Pinterest

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी विवाद में नया घटनाक्रम सामने आया है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत द्वारा मध्यस्थता प्रक्रिया से दूरी बनाने के बाद पाकिस्तान को न केवल अपना बल्कि भारत के हिस्से का भी मध्यस्थता खर्च उठाना पड़ रहा है. बताया जा रहा है कि अब तक इस प्रक्रिया पर पाकिस्तान 6 लाख डॉलर (600,000 डॉलर) से अधिक खर्च कर चुका है और मामला आगे बढ़ने के साथ यह राशि और बढ़ सकती है.

 भारत के फैसले के बाद बढ़ा आर्थिक बोझ

सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुसार, मध्यस्थता से जुड़ी लागत दोनों देशों को बराबर-बराबर वहन करनी होती है लेकिन अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस प्रक्रिया में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी और कहा कि सीमा पार आतंकवाद पर पाकिस्तान की ओर से 'विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय' कार्रवाई होने तक संधि को स्थगित (Abeyance) माना जाएगा. इसके बाद पाकिस्तान ने अकेले ही मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रखने का फैसला किया.

किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर विवाद

पूरा विवाद भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर है, जो पश्चिमी नदियों पर बनाई जा रही हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि ये परियोजनाएं सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं. इसी आधार पर उसने हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) का दरवाजा खटखटाया है. दूसरी ओर भारत का कहना है कि इस तरह के तकनीकी विवादों का समाधान न्यूट्रल एक्सपर्ट के माध्यम से होना चाहिए, न कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण के जरिए.

भारत ने PCA के अधिकार क्षेत्र को ठुकराया

भारत लगातार यह कहता रहा है कि परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का गठन इस मामले में वैध नहीं है और उसके किसी भी फैसले को भारत स्वीकार नहीं करेगा. नई दिल्ली का तर्क है कि संधि के तहत एक ही विवाद पर समानांतर विवाद निपटान तंत्र नहीं चल सकते. हालांकि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता नियमों के तहत, यदि न्यायाधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र को उचित मानता है तो किसी एक पक्ष की अनुपस्थिति में भी कार्यवाही जारी रह सकती है. इसी आधार पर PCA ने पाकिस्तान की याचिका पर सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया है.

लंबी कानूनी लड़ाई के संकेत

रिपोर्ट के अनुसार, जब तक पाकिस्तान मध्यस्थता की प्रक्रिया जारी रखेगा और भारत उससे दूर रहेगा, तब तक पूरे खर्च का बोझ इस्लामाबाद पर ही पड़ सकता है. इससे पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव बढ़ने की संभावना है, जबकि भारत अपने रुख पर कायम है कि विवाद का समाधान संधि के मूल ढांचे के अनुरूप ही होना चाहिए.