23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती देशभर में 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाई जाती है. यह दिन उनके अदम्य साहस और राष्ट्र के लिए समर्पण को याद करने का अवसर देता है. लेकिन नेताजी का जीवन जितना प्रेरणादायक था, उनका अंत उतना ही रहस्यमय रहा. उनकी कथित मृत्यु से जुड़े सवाल आज भी लोगों के मन में हैं, खासकर तब, जब गुमनामी बाबा को उनसे जोड़ने की थ्योरी बार-बार सामने आती रही है.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे. आईसीएस परीक्षा पास करने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की सेवा छोड़ देश की आजादी का मार्ग चुना. कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले नेताजी ने बाद में आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व किया. 1941 में कोलकाता से नजरबंदी से भागकर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी चुनौती दी.
सरकारी तौर पर यह कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू, जापानी कब्जे वाले ताइवान में विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई. हालांकि, उनके कई समर्थकों ने इस दावे को कभी स्वीकार नहीं किया. उनका मानना रहा कि यह कहानी मित्र देशों को भ्रमित करने के लिए बनाई गई थी, ताकि नेताजी गुप्त रूप से अपना संघर्ष जारी रख सकें.
गुमनामी बाबा, जिन्हें भगवानजी भी कहा जाता था, उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में राम भवन में रहते थे. बताया जाता है कि वे परदे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते थे. 16 सितंबर 1985 को उनका निधन हुआ और दो दिन बाद अयोध्या के गुप्तार घाट पर अंतिम संस्कार किया गया. उनके कुछ अनुयायियों और परिचितों ने दावा किया कि वे वास्तव में नेताजी थे.
कई लेखकों और पत्रकारों ने गुमनामी बाबा और नेताजी के बीच संबंध तलाशने की कोशिश की. बाबा के कमरे से मिले पत्रों, नोट्स और दस्तावेजों को नेताजी से जोड़ा गया. कुछ पुस्तकों में दावा किया गया कि बाबा का संपर्क आजाद हिंद फौज के पूर्व अधिकारियों से था. हस्तलेखन विशेषज्ञों की राय का हवाला देकर भी दोनों को एक ही व्यक्ति बताया गया.
नेताजी के परिवार ने गुमनामी बाबा से जुड़ी थ्योरी को सिरे से खारिज किया है. उनका कहना है कि यह नेताजी के सम्मान के खिलाफ है. परिवार ने माना कि नेताजी का अंत रहस्यमय है, लेकिन गुमनामी बाबा से जोड़ने के लिए ठोस सबूत नहीं हैं. उन्होंने लोगों से अपील की है कि उपलब्ध सरकारी फाइलों को पढ़कर ही कोई निष्कर्ष निकाला जाए.