Nautapa 2025: हर साल मई के आखिरी सप्ताह में जब तापमान चरम पर पहुंचता है, तब एक विशेष कालखंड शुरू होता है जिसे 'नौतपा' कहा जाता है. यह वह समय होता है जब सूर्य की तपिश सबसे तीव्र मानी जाती है और ऐसा कहा जाता है कि इन 9 दिनों में मानो आसमान से आग बरसती है. ग्रामीण मान्यताओं से लेकर आधुनिक विज्ञान तक, नौतपा को लेकर कई तरह की धारणाएं हैं. जहां एक ओर लोग इससे बचने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि अगर नौतपा में पर्याप्त गर्मी नहीं पड़ी, तो वर्षा ऋतु प्रभावित हो सकती है, जिससे कृषि पर बड़ा असर पड़ता है.
आइए जानते हैं कि आखिर नौतपा में इतनी तेज गर्मी क्यों पड़ती है, इसका वैज्ञानिक पक्ष क्या है, और यदि यह गर्मी न पड़ी तो इससे कितना नुकसान हो सकता है.
नौतपा सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश के साथ शुरू होता है. इस दौरान सूर्य पृथ्वी के बेहद करीब होता है, जिससे इसकी किरणें सीधी और तीव्र होकर जमीन पर गिरती हैं. इससे तापमान तेजी से बढ़ता है. साथ ही, इन दिनों में आर्द्रता (Humidity) बहुत कम होती है, जिससे गर्मी और अधिक झुलसाने वाली महसूस होती है.
विज्ञान कहता है कि पृथ्वी की कक्षा और सूर्य की स्थिति के कारण मई-जून का यह समय उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे गर्म होता है. परंपराओं में इसे 'नौतपा' कहा गया है क्योंकि यह आग जैसी गर्मी लाता है.
कई बार लोग सोचते हैं कि अगर गर्मी कम हो तो अच्छा है, लेकिन कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि नौतपा का गर्म होना मानसून के लिए बेहद जरूरी है. जब जमीन और वातावरण पूरी तरह गर्म हो जाता है, तब बादलों को खिंचाव मिलता है और अच्छी बारिश होती है.
अगर नौतपा ठंडा रहा या बादल छाए रहे, तो यह संकेत हो सकता है कि मानसून कमजोर रहेगा. इससे धान, मक्का, कपास जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है और खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आ सकती है. नौतपा केवल एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि भारतीय कृषि और पारंपरिक ज्ञान का एक अहम हिस्सा है. इसकी गर्मी जितनी कष्टदायक होती है, उतनी ही जरूरी भी है – खासकर एक अच्छे मानसून और फसल उत्पादन के लिए.