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India Daily

कैसे 562 टुकड़ों से बना एक मजबूत भारत, आजादी के बाद कुछ इस तरह एकजुट हुआ देश

भारत के स्वतंत्र होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी, 562 रियासतों को एकजुट कर एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करना. यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी एक असंभव लगने वाला कार्य था, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने अपनी कुशलता से संभव बनाया.

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Edited By: Babli Rautela
कैसे 562 टुकड़ों से बना एक मजबूत भारत, आजादी के बाद कुछ इस तरह एकजुट हुआ देश
Courtesy: Social Media

स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी-बड़ी रियासतें थीं. इन रियासतों के अपने-अपने राजा, कानून और शासन प्रणाली थे. ब्रिटिश शासन के दौरान ये रियासतें आधिकारिक रूप से स्वतंत्र तो नहीं थीं, लेकिन ब्रिटिश सत्ता के अधीन रहते हुए भी अपनी सीमित स्वायत्तता रखती थीं.

वी.पी. मेनन ने अपनी फेमस पुस्तक द स्टोरी ऑफ इंटीग्रेशन ऑफ इंडियन स्टेट्स में लिखा कि 'भारत के एकीकरण की प्रक्रिया केवल भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक रूप से एक राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया थी.' उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक-एक रियासत को भारत में शामिल करने के लिए कूटनीति, संवाद और दृढ़ संकल्प का सहारा लिया गया.

सरदार पटेल की भूमिका 

भारत के लौह पुरुष कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री के रूप में इस कार्य की बागडोर संभाली. उन्होंने न केवल रियासतों के शासकों से संवाद किया बल्कि उन्हें एकीकृत भारत की शक्ति और आवश्यकता भी समझाई.

5 जुलाई 1947 को राज्य मंत्रालय के गठन के दिन पटेल ने कहा था, 'कांग्रेस किसी भी तरह से राज्यों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती.' लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, उन्होंने अपने दृष्टिकोण को अधिक स्पष्ट किया. 16 दिसंबर 1947 को उन्होंने कहा, 'राजाओं का भविष्य अपनी जनता और अपने देश की सेवा में निहित है, न कि उनकी निरंकुशता के दावों में.'

वी.पी. मेनन: पर्दे के पीछे के रणनीतिकार

जहां सरदार पटेल इस एकीकरण के चेहरे बने, वहीं इसके रणनीतिक मस्तिष्क वी.पी. मेनन थे. वे एक सिविल सर्वेंट के रूप में पटेल के सबसे विश्वसनीय सहयोगी रहे. मेनन ने राजनीतिक समझ और दस्तावेज़ी निपुणता के जरिए हर रियासत के साथ समझौते तैयार किए.

उन्होंने लिखा, '554 रियासतों में से अधिकांश को प्रांतों या संघों में मिला दिया गया. इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारत में केवल 14 प्रशासनिक इकाइयाँ बचीं.' इस कठिन कार्य में उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी व्यावहारिक नीति और संवाद कौशल ने आखिरकार सफलता दिलाई.

हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर: सबसे कठिन चुनौतियां

कई रियासतों ने एकीकरण का विरोध किया, जिनमें हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर सबसे प्रमुख थीं. हैदराबाद के निजाम भारत में विलय के खिलाफ थे, लेकिन ‘ऑपरेशन पोलो’ के माध्यम से राज्य का शांतिपूर्ण विलय सुनिश्चित किया गया. जूनागढ़ ने पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा की, परंतु जनमत संग्रह के बाद वह भारत का हिस्सा बना. कश्मीर का मामला सबसे जटिल रहा, लेकिन महाराजा हरि सिंह के हस्ताक्षर के बाद वह भी भारत में शामिल हो गया.

562 से 14 इकाइयों तक: एक राष्ट्र की नई पहचान

मेनन ने लिखा कि 'भारत के एकीकरण के परिणामस्वरूप 554 रियासतों की जगह 14 प्रशासनिक इकाइयां उभरीं.' यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि यह एक नई राष्ट्रीय पहचान का जन्म था. इससे भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई और संविधान के निर्माण का रास्ता साफ हुआ.