महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. शिवसेना (UBT) के लिए एक और बड़ा झटका तब लगा, जब पार्टी के विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का फैसला कर लिया.
पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद उन्होंने शिवसेना उम्मीदवार के रूप में महाराष्ट्र विधान परिषद के उपसभापति पद के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर शिंदे की राजनीतिक रणनीति, जिसे उनके समर्थक 'ऑपरेशन टाइगर' के नाम से जानते हैं, को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
सचिन अहीर का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ ही दिन पहले शिवसेना के छह लोकसभा सांसद भी शिंदे गुट में शामिल हुए थे. पार्टी में हुई टूट के बाद यह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले खेमे के लिए सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जा रहा है. इन सांसदों ने शिंदे गुट में शामिल होने से पहले नई दिल्ली में आयोजित शिवसेना संसदीय दल की अहम बैठक से दूरी बना ली थी. उनकी गैर-मौजूदगी के कारण बैठक में केवल तीन सांसद ही शामिल हो सके थे. इस घटनाक्रम ने तभी संकेत दे दिए थे कि पार्टी के भीतर बड़ा राजनीतिक बदलाव होने वाला है.
शिंदे गुट में शामिल होने वाले नेताओं में यवतमाल से संजय देशमुख, परभणी से संजय जाधव, मुंबई उत्तर-पूर्व से संजय दीना पाटिल, हिंगोली से नागेश पाटिल-अष्टिकर, धाराशिव से ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और शिरडी से भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं. इन सभी नेताओं के शामिल होने से शिंदे गुट की राजनीतिक ताकत और बढ़ी है. इन सांसदों ने दक्षिण मुंबई स्थित यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एकनाथ शिंदे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में औपचारिक रूप से शिवसेना की सदस्यता ग्रहण की.
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने नए साथियों का स्वागत करते हुए कहा कि उनकी पार्टी में शामिल हुए सभी सांसद अनुभवी और जनता के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले नेता हैं. उन्होंने कहा कि मेरे ऑपरेशन हमेशा सफल होते हैं. ऑपरेशन टाइगर अब पूरी तरह सफल हो चुका है. शिंदे ने इन नेताओं को 'धुरंधर' बताते हुए कहा कि वे जमीन से जुड़े हुए जनप्रतिनिधि हैं और उनके आने से संगठन को और मजबूती मिलेगी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे इन दल-बदल से महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता संतुलन तेजी से बदल रहा है. इन सांसदों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की थी. ऐसे में उनके शिंदे खेमे में जाने से न केवल उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है, बल्कि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन में भी एकनाथ शिंदे की भूमिका और प्रभाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.