इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने नोटों की बरामदगी वाले विवाद के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. पिछले साल मार्च में दिल्ली के उनके आवास पर जले हुए नोटों के बंडल बरामद होने के बाद यह मामला सुर्खियों में आया था. जस्टिस वर्मा पिछले साल अप्रैल में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बने थे. इस्तीफा देने से पहले उनके खिलाफ इन-हाउस जांच चल रही थी और संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी.
पिछले साल मार्च में जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पर जले हुए नोटों के बंडल मिलने का मामला सामने आया था. इसके बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था. इस घटना के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने तीन सदस्यीय समिति गठित की थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट बी.वी. आचार्य शामिल थे.
जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी. उन्होंने दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कहा कि दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद ही समिति गठित की जा सकती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में उनकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि संसदीय प्रक्रिया को रोकने के लिए कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि जजों की सुरक्षा संसद की हटाने की प्रक्रिया को पंगु बनाने का बहाना नहीं बन सकती.
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अब इस्तीफा देकर विवाद को खत्म करने का रास्ता चुना है. उनका इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा गया है. इससे संसद में चल रही महाभियोग की प्रक्रिया अपने आप खत्म हो जाएगी. जस्टिस वर्मा का यह कदम ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ जांच और संसदीय कार्यवाही दोनों चल रही थीं.
जस्टिस वर्मा का इस्तीफा न्यायपालिका और संसद के बीच के रिश्ते को लेकर उठे सवालों के बीच महत्वपूर्ण है. यह घटना जजों की जवाबदेही और नैतिकता पर भी चर्चा छेड़ेगी. अब देखना होगा कि भविष्य में ऐसे मामलों में क्या नई प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं.