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56 धोतियां, 17 फीट की दीवार और अंग्रेजों की सुरक्षा! आजादी की लड़ाई का सबसे साहसी जेल ब्रेक

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण और उनके पांच साथियों ने हजारीबाग जेल से कैसे फरार होकर भूमिगत आंदोलन को आगे बढ़ाया, जानिए पूरी कहानी.

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56 धोतियां, 17 फीट की दीवार और अंग्रेजों की सुरक्षा! आजादी की लड़ाई का सबसे साहसी जेल ब्रेक
Courtesy: AI Generated

आजादी की लड़ाई का हजारीबाग जेल ब्रेक: साल 1942. देश में भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था. अंग्रेजी सरकार ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया था. ऐसे समय में हजारीबाग जेल में बंद जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों ने ऐसा कारनामा किया, जिसने ब्रिटिश सरकार की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे दी. दीपावली की रात जेल की ऊंची दीवार पार कर निकले इन क्रांतिकारियों ने बाद में भूमिगत आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया और अगले दिन देशभर में आंदोलन की लहर फैल गई. ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू कर दीं. जयप्रकाश नारायण भी इसी दमन का शिकार हुए और उन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया. उस समय बिहार का यह जेल राजनीतिक बंदियों के लिए महत्वपूर्ण कारावास केंद्र बन चुका था.

ब्रिटिश सरकार की रणनीति साफ थी- आंदोलन के प्रमुख नेताओं को जेल में बंद कर दिया जाए, ताकि वे जनता से संपर्क न कर सकें और आंदोलन का नेतृत्व कमजोर पड़ जाए. लेकिन जेल के भीतर बैठे जयप्रकाश नारायण ने इसे आंदोलन का अंत नहीं माना, बल्कि यहीं से एक ऐसी योजना तैयार होने लगी, जिसने आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन के भूमिगत चरण को मजबूती दी.

जेल से निकलने की क्यों बनाई गई योजना?

जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों का मानना था कि बाहर रहकर वे आंदोलन को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं. उस समय देश के अनेक बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे. इसलिए भूमिगत नेटवर्क के जरिए आंदोलन को जीवित रखना बेहद जरूरी था.

हजारीबाग जेल में बंद कुछ प्रमुख क्रांतिकारियों ने जेल से निकलने की योजना पर काम शुरू किया. इस समूह में जयप्रकाश नारायण के अलावा योगेंद्र शुक्ल, रामानंदन मिश्र, शालिग्राम सिंह, सूरज नारायण सिंह और गुलाब चंद गुप्ता के नाम मिलते हैं. इन लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी जेल की सुरक्षा, लेकिन इसी चुनौती के बीच उन्होंने एक ऐसा तरीका खोजा जिसकी कल्पना शायद ब्रिटिश अधिकारियों ने भी नहीं की थी.

दीपावली की रात चुनी गई भागने के लिए

9 नवंबर 1942 की रात दीपावली थी. त्योहार के कारण जेल की सामान्य दिनचर्या और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव आया था. उपलब्ध विवरणों के मुताबिक कुछ सुरक्षाकर्मी छुट्टी पर थे और जेल के अंदर त्योहार का माहौल था.

क्रांतिकारियों ने इसी मौके को अपने लिए सबसे उपयुक्त माना. रात में योजना को अंजाम दिया गया. जेल की करीब 17 फीट ऊंची दीवार उनके सामने थी. बाहर निकलने के लिए कपड़ों और धोतियों से तैयार किए गए अस्थायी सहारे का इस्तेमाल किया गया. कई विवरणों में 56 धोतियों का उल्लेख मिलता है. यह कोई सामान्य भागने की कोशिश नहीं थी. एक गलत कदम का मतलब था पकड़े जाना, गोली चलना या फिर लंबे समय के लिए कठोर कारावास.

17 फीट की दीवार बनी सबसे बड़ी चुनौती

जेल की दीवार पार करना इस योजना का सबसे जोखिम भरा हिस्सा था. क्रांतिकारियों ने एक-दूसरे की मदद से दीवार तक पहुंचने और उसे पार करने की कोशिश की. उपलब्ध विवरण बताते हैं कि योगेंद्र शुक्ल ने इस पूरी कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दीवार पार करने के बाद वे जेल से बाहर निकल चुके थे, लेकिन असली चुनौती अब शुरू हुई थी. ब्रिटिश पुलिस को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उनकी तलाश शुरू कर दी गई. हर रास्ते पर नजर थी. रेलवे स्टेशनों, सड़कों और संभावित ठिकानों पर निगरानी बढ़ाई गई. इसके बावजूद वे तत्काल ब्रिटिश पुलिस की गिरफ्त में नहीं आए.

जेल से बाहर निकलते ही शुरू हुआ भूमिगत संघर्ष

हजारीबाग जेल से निकलने के बाद जयप्रकाश नारायण का लक्ष्य केवल खुद को बचाना नहीं था. वे भारत छोड़ो आंदोलन के भूमिगत नेटवर्क को मजबूत करना चाहते थे. जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों ने बिहार तथा आसपास के क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियों को संगठित करने की कोशिश की. आगे चलकर नेपाल के तराई क्षेत्र से भी भूमिगत गतिविधियों को संगठित किया गया.

इसी दौर में 'आजाद दस्ता' जैसी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है, जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भूमिगत प्रतिरोध को संगठित करने का प्रयास किया. इसलिए हजारीबाग जेल से भागने की घटना को केवल एक 'जेल ब्रेक' के रूप में देखना अधूरा होगा. यह वास्तव में भारत छोड़ो आंदोलन के उस चरण का हिस्सा थी, जब गिरफ्तारियों के बावजूद आंदोलन को जिंदा रखने के लिए भूमिगत नेटवर्क तैयार किए जा रहे थे.

अंग्रेजों के लिए यह सिर्फ छह कैदियों का भागना नहीं था

ब्रिटिश सरकार के लिए यह घटना इसलिए गंभीर थी क्योंकि जेल से निकलने वालों में जयप्रकाश नारायण जैसे प्रभावशाली समाजवादी नेता शामिल थे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेज पहले ही बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कर चुके थे. ऐसे में एक महत्वपूर्ण जेल से राजनीतिक बंदियों का निकल जाना प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता था.

जयप्रकाश नारायण का बाहर निकलना आंदोलन के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण था. इससे यह संदेश गया कि नेताओं को जेल में डालकर आंदोलन की आवाज को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता.

इस घटना में योगेंद्र शुक्ल की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण थी

हजारीबाग जेल ब्रेक की कहानी अक्सर सिर्फ जयप्रकाश नारायण के नाम से सुनाई जाती है. लेकिन इस घटना को समझने के लिए योगेंद्र शुक्ल जैसे क्रांतिकारी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वे पहले से ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे थे और जेल का लंबा अनुभव रखते थे. हजारीबाग से निकलने की योजना में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है.

यही वजह है कि इस घटना की कहानी केवल एक नेता के साहस की कहानी नहीं है. यह कई क्रांतिकारियों के सामूहिक साहस, योजना और जोखिम उठाने की कहानी है. पैरों में चोट लगी, लेकिन सफर नहीं रुका जेल की दीवार पार करना केवल पहला चरण था.

बाहर निकलने के बाद ब्रिटिश पुलिस से बचते हुए लंबी दूरी तय करनी थी. रास्ते आसान नहीं थे और हर समय पकड़े जाने का खतरा था. कुछ विवरणों में बताया गया है कि यात्रा के दौरान जयप्रकाश नारायण की तबीयत और शारीरिक स्थिति भी ठीक नहीं थी. उनके साथियों ने कठिन परिस्थितियों में उनका साथ दिया. यही वह दौर था जिसने इस जेल ब्रेक को एक लंबी भूमिगत यात्रा में बदल दिया.

क्यों याद किया जाता है हजारीबाग जेल ब्रेक?

इतिहास में इस घटना की अहमियत केवल इसलिए नहीं है कि कुछ कैदी जेल से भाग गए थे. इसका असली महत्व इस बात में है कि यह घटना उस समय हुई जब भारत छोड़ो आंदोलन के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर अंग्रेजी सरकार आंदोलन की कमर तोड़ने की कोशिश कर रही थी. जयप्रकाश नारायण के बाहर आने से भूमिगत आंदोलन को एक महत्वपूर्ण नेता मिला. इस घटना ने यह भी दिखाया कि ब्रिटिश दमन के बावजूद आंदोलन के भीतर वैकल्पिक नेतृत्व और संगठन खड़ा करने की क्षमता मौजूद थी.

इतिहास में दर्ज हुई दीपावली की वह रात

आज जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है तो दांडी मार्च, भारत छोड़ो आंदोलन, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे बड़े नाम अक्सर चर्चा में आते हैं, लेकिन हजारीबाग जेल ब्रेक जैसी घटनाएं बताती हैं कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े आंदोलनों और प्रसिद्ध नेताओं की कहानी नहीं थी.

इसके पीछे हजारों छोटे-बड़े साहसिक प्रयास भी थे

9 नवंबर 1942 की वह रात इसी संघर्ष का एक ऐसा अध्याय है, जब छह राजनीतिक बंदियों ने करीब 17 फीट ऊंची जेल की दीवार पार की और ब्रिटिश शासन को यह संदेश दिया कि सलाखें आंदोलन की आवाज को हमेशा कैद नहीं रख सकतीं. उपलब्ध स्रोत इस घटना को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण के भूमिगत संघर्ष की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में दर्ज करते हैं.

हजारीबाग जेल ब्रेक को स्वतंत्रता संग्राम के सबसे साहसी जेल से भागने के प्रयासों में गिना जा सकता है. दीपावली की रात, ऊंची जेल की दीवार, धोतियों से बनाया गया अस्थायी सहारा और ब्रिटिश पुलिस से बचते हुए भूमिगत आंदोलन में लौटना- ये सभी बातें इस घटना को बेहद रोमांचक बनाती हैं.

लेकिन इसकी सबसे बड़ी सीख रोमांच से आगे जाती है. अंग्रेजों ने नेताओं को जेल में बंद करके आंदोलन को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन हजारीबाग से बाहर निकलने के बाद जयप्रकाश नारायण ने उसी आंदोलन को भूमिगत रास्ते से आगे बढ़ाने की कोशिश की.

यही वजह है कि 1942 का हजारीबाग जेल ब्रेक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन कम चर्चित अध्यायों में शामिल है, जिनमें एक छोटी-सी घटना ने बड़े राजनीतिक संघर्ष को नई दिशा देने में भूमिका निभाई.