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सुरक्षाबलों की आंखों में धूल झोंक रहे आतंकी, क्या दहशतगर्दों की मदद कर रहे स्थानीय लोग?

Jammu Terrorist Attack: जम्मू में जुलाई महीने में अलग-अलग आतंकी हमलों अब तक 12 जवान शहीद हो चुके हैं. हर हमले के बाद सुरक्षाबलों की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई, लेकिन हर बार आतंकी भागने में कामयाब रहे. अक्सर हमलों के बाद सवाल उठने लगे थे कि आखिर सुरक्षाबलों की निगरानी के बावजूद आतंकी कैसे वारदातों को अंजाम दे रहे हैं. फिलहाल, पुलिस ने मदद की आशंका में दो स्थानीय लोगों को उठाया है, जिनसे पूछताछ की जा रही है.

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सुरक्षाबलों की आंखों में धूल झोंक रहे आतंकी, क्या दहशतगर्दों की मदद कर रहे स्थानीय लोग?
Courtesy: Social Media

Jammu Terrorist Attack: जम्मू क्षेत्र में पुलिस ने आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े दो एक्टिव मेंबर्स को गिरफ्तार किया है. कहा जा रहा है कि आतंकियों की मदद के शक में दोनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इनकी मदद से ही आतंकी अब तक बचते रहे हैं. गिरफ्तारी के अलावा, अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने का अपील की है. दो स्थानीय लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की ओर से बयान जारी किया गया. बताया गया कि आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों का समर्थन करने के लिए दो ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGW) की पहचान की गई और उन्हें गिरफ्तार किया गया है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन गिरफ्तारियों ने जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों के फिर से उभरने में स्थानीय लोगों की ओर से मदद के संदेह को बल मिला है. पुलिस की ओऱ से बताया गया है कि जिन दो लोगों की गिरफ्तारी की गई है, उनमें लायाकत अली, उर्फ ​​पावु शामिल है, जो कठुआ के बिलावर वार्ड नंबर 7 का रहने वाला है. इसके अलावा, कठुआ के ही बाउली मोहल्ले के रहने वाले मूल राज उर्फ ​​जेनजू को भी गिरफ्तार किया गया है. 

ऐसे इलाकों में आरोपियों के घर, जहां रात में कोई दस्तक दे तो...

गिरफ्तार किए गए अली और राज, जम्मू-कश्मीर से होकर गुजरने वाली पीर पंजाल पर्वतमाला में बसे गांव के रहने वाले हैं. दक्षिण में जम्मू और उत्तर में कश्मीर घाटी से काफी दूर इनका गांव है, जहां इंटरनेट सेवा मौजूद नहीं है. ये इलाका ऐसा है कि अगर रात में किसी के दरवाजे पर कोई दस्तक देता है, तो इसका मतलब ये होता है कि या तो वो आतंकवादी होगा, या तो पुलिस या फिर कोई चचेरा भाई जिसने जंगल में अपनी गाय खो दी हो. 

अली और राज का गांव बदनोटा की सीमा के भीतर हैं, जहां 8 जुलाई को दो ट्रकों के गश्ती दल पर घात लगाकर किए गए थे. हमले में 22 गढ़वाल राइफल्स के पांच जवान मारे गए थे. ये इलाका माचेडी फॉरेस्ट रेंज में आता है, जो काफी सुदूर और ऊबड़-खाबड़ इलाका है, गहरी घाटियों, घने पेड़ों और पहाड़ी गुफाओं से भरा हुआ है.

माचेडी फॉरेस्ट रेंज छोटे समूहों में काम करने वाले आतंकवादियों के लिए मुफीद मानी जाती है. इस खतरनाक इलाके में सुरक्षा बलों को ड्रोन, हेलीकॉप्टर और खोजी कुत्तों के होने के बावजूद तलाशी अभियानों में काफी मशक्कत करनी पड़ती है. इन सारी स्थितियों को देखते हुए सवाल उठता है कि आखिर जब सेना को इतनी दिक्कतें होती हैं, तो फिर पाकिस्तान की ओर से आए आतंकी कैसे हमलों को अंजाम देते हैं और सुरक्षाबलों की कार्रवाई से बच जाते हैं?

ये सवाल उठता है कि परिस्थियों के विपरीत होने के बावजूद जब वे सुरक्षाबलों की कार्रवाई से बच रहे हैं, तो क्या उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन मिल रहा है? क्या वे स्थानीय लोगों के समर्थन के लिए बंदूक या फिर किसी तरह के लालच का यूज कर रहे हैं?

लंबे समय से अधिकारी करते रहे हैं ये दावा

सेना के कुछ अधिकारियों का भी मानना है कि जिन इलाकों में हम तमाम सुविधाओं के बावजूद आतंकियों को पकड़ नहीं पाते, वहां पाकिस्तान से आए आतंकी आखिर कैसे जंगलों का सहारा लेकर भाग निकलते हैं. ये सबकुछ स्थानीय लोगों के बिना संभव नहीं है. सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, जंगल में 60 से अधिक विदेशी आतंकवादी एक्टिव हैं, जो काफी ट्रेंड हैं. आतंकियों का ये समूह इरीडियम सैटेलाइट फोन और थर्मल इमेजरी समेत डेवलप टेक्निक से लैस हैं और अमेरिकी M4 कार्बाइन जैसे हथियारों का उपयोग करते हैं.

आंतकी हमलों को दहशतगर्दों की ओर से आसानी से अंजाम देना सुरक्षाबलों के लिए चुनौती है और इसका संकेत भी तब मिलता है, जब हमलों को अंजाम देने के बाद आतंकी वहां से जंगलों का सहारा लेते हुए अपने ठिकानों पर सुरक्षित पहुंच जाते हैं. हाल के हमले, जैसे कि 8 जुलाई को सेना की पेट्रोलिंग टीम पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया. घात लगाकर हमला करना ही उन्हें स्थानीय समर्थन का संकेत है. आखिर उन्हें कैसे पता कि कब सेना के जवान कहां गश्ती करेंगे? 

अली और राज से पहले पुलिस ने शौकत अली समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया था, जिन्होंने कथित तौर पर डोडा जिले के देसा जंगल में 15 जुलाई के हमले से पहले तीन आतंकवादियों को खाना, रहने की जगह और वाईफाई की सुविधा मुहैया कराई थी. 15 जुलाई को हुए हमले में 4 जवान शहीद हुए थे.

सेना के रिटायर्ड जवान ने क्या कहा?

सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी ने विदेशी आतंकवादी मदद के लिए या ओवर ग्राउंड वर्कर्स के रूप में काम करने के लिए स्थानीय लोगों को बड़ी रकम का लालच दे सकते हैं. इसके बदले स्थानीय लोग आतंकियों को रसद सहायता और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराते हैं. 

19 जून को पुलिस ने 45 साल के हकम दीन नाम के व्यक्ति को गिरफ़्तार किया, जो कथित तौर पर एक ओवर ग्राउंड वर्कर है. हकम दीन, 9 जून को रियासी जिले में तीर्थयात्रियों को ले जा रही एक बस पर हमला करने वाले संदिग्ध पाकिस्तानी बंदूकधारियों के समूह को जानकारी और रहने के लिए जगह देने का मुख्य संदिग्ध है. इस आतंकी हमले में 9 तीर्थयात्री मारे गए थे. हकम दीन को कथित तौर पर आतंकियों की मदद के लिए 6,000 रुपये मिले थे. पुलिस का दावा है कि ये रकम आतंकियों के पास से मिले हैं.

एक सुरक्षा सूत्र ने कहा कि जीपीएस या अन्य नेविगेशन सहायता का उपयोग किए बिना आतंकवादियों को मार्गदर्शन के लिए स्थानीय लोगों की आवश्यकता होती है. भांगरी गोलीबारी और चटरगला पर्वत दर्रे पर हमले समेत हाल के आतंकवादी हमलों ने स्थानीय गुर्गों पर आतंकवादियों की निर्भरता को उजागर किया.

सेना की आशंका के बीच स्थानीय लोगों ने क्या कहा?

सेना की आशंका के बीच स्थानीय लोगों ने आतंकवादियों के साथ किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया. नाम न बताने की शर्त पर एक ग्रामीण ने बताया कि जब कोई जिहादी आपके सिर पर AK-47 तान दे और भोजन की मांग करे, तो आप क्या करेंगे? आत्मसमर्पण करें या वापस लड़ें? पुलिस को सूचित करें और प्रतिशोध का जोखिम उठाएं?

आतंकवाद से संबंधित हिंसा में वृद्धि ने ऊपरी इलाकों में स्थानीय लोगों को चिंतित कर दिया है, जिन्होंने खतरों से निपटने के लिए ग्राम रक्षा समूहों (VDG) को मजबूत करने की मांग की है. डोडा के क्रालान गांव जैसी जगहों पर, VDG जवाबी हमले में सुरक्षा बलों की सहायता कर रहे हैं.

ऐतिहासिक रूप से, खानाबदोश गुज्जर-बकरवाल समुदाय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण खुफिया स्रोत रहा है. हालांकि, हाल की घटनाओं ने इस रिश्ते को खराब कर दिया है. पहाड़ियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने और पिछली सर्दियों में सेना की हिरासत में समुदाय के तीन सदस्यों की मौत ने कुछ बकरवाल सदस्यों के बीच विश्वासघात की भावना पैदा कर दी है. बकरवाल समुदाय के आदिल खान ने कहा कि हमारे समुदाय ने हमेशा सेना का समर्थन किया है.