कौन हैं इरोम चानू शर्मिला जिन्होंने आज ही के दिन खत्म किया था अपना 16 साल पुराना ऐतिहासिक आंदोलन

इरोम चानू शर्मिला ने मणिपुर में AFSPA हटाने की मांग को लेकर करीब 16 साल तक अनशन किया था. 9 अगस्त 2016 को शहद चखकर उन्होंने ऐतिहासिक अनशन समाप्त किया.

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Sagar Bhardwaj

इरोम चानू शर्मिला को देश-दुनिया में ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम यानी AFSPA के विरोध में करीब 16 वर्षों तक भूख हड़ताल की. उनका संघर्ष मणिपुर में सुरक्षा बलों को मिले विशेष अधिकारों और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े सवालों पर केंद्रित था. उनका यह आंदोलन अहिंसक प्रतिरोध का एक चर्चित उदाहरण बना.

मालोम कांड के बाद लिया फैसला

शर्मिला ने नवंबर 2000 में अपना अनशन शुरू किया था. इससे पहले 2 नवंबर 2000 को मणिपुर के मालोम इलाके में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 10 नागरिकों की मौत हुई थी. इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. इसके बाद उन्होंने AFSPA हटाने की मांग को लेकर भोजन त्याग दिया और अपना पूरा जीवन इस आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया.

नली के जरिए दी जाती थी खुराक

लंबे अनशन के दौरान शर्मिला को कई बार हिरासत में लिया गया. उन्हें जीवित रखने के लिए नाक के जरिए ट्यूब डालकर पोषण दिया जाता था. उनका अधिकांश समय इंफाल के अस्पताल में न्यायिक हिरासत के बीच बीता. इसके बावजूद उन्होंने अपना विरोध जारी रखा. करीब 16 साल तक चलने वाले इस संघर्ष ने उन्हें मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों का अंतरराष्ट्रीय चेहरा बना दिया. ([Al Jazeera][3])


9 अगस्त 2016 को तोड़ा अनशन

9 अगस्त 2016 को इरोम शर्मिला ने अपना ऐतिहासिक अनशन खत्म करने का फैसला किया. उन्होंने अदालत में सुनवाई के बाद जमानत मिलने के दौरान शहद की एक बूंद चखकर अपना उपवास समाप्त किया. इस मौके पर वह भावुक भी हो गईं. अनशन खत्म करने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि अब वह राजनीति के जरिए अपनी मांग को आगे बढ़ाना चाहती हैं. ([The Indian Express][4])

राजनीति में उतरीं, चुनाव भी लड़ा

अनशन खत्म करने के बाद शर्मिला ने चुनावी राजनीति में कदम रखा. उनका मानना था कि AFSPA में बदलाव और बड़े सामाजिक सुधारों के लिए राजनीतिक ताकत जरूरी है. उन्होंने 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में भी किस्मत आजमाई. हालांकि चुनावी राजनीति में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन करीब 16 साल का उनका अनशन आज भी भारतीय लोकतंत्र में लंबे अहिंसक आंदोलनों के सबसे असाधारण उदाहरणों में गिना जाता है.