नई दिल्ली: पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को फिलहाल स्थगित करने का फैसला लिया. इसके बाद पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया. इसी बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि भारत आखिर इस 65 वर्ष पुरानी संधि में बदलाव की जरूरत क्यों महसूस कर रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते पर्यावरण, नई तकनीक और पानी की बढ़ती मांग के कारण अब इस समझौते की समीक्षा समय की जरूरत बन गई है.
भारत ने पाकिस्तान को सिंधु जल संधि में संशोधन और पुनर्विचार के लिए दो औपचारिक नोटिस भेजे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह असामान्य कदम नहीं है. दुनिया की कई अंतरराष्ट्रीय जल संधियों में समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे हैं, ताकि उन्हें नई परिस्थितियों और तकनीकी बदलावों के अनुरूप बनाया जा सके.
विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों का स्वरूप और जल प्रवाह समय के साथ बदलता रहता है. आबादी बढ़ने, सिंचाई की जरूरतों, वैज्ञानिक प्रगति और नई तकनीकों के कारण दशकों पुराने समझौते कई बार वर्तमान जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते. इसलिए समय-समय पर समीक्षा को व्यावहारिक माना जाता है.
अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक दुनिया में सीमा पार बहने वाली नदियों पर 800 से अधिक समझौते लागू हैं. इनमें कई संधियों में बाद के वर्षों में नए प्रोटोकॉल, डेटा साझा करने की व्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और संयुक्त जल प्रबंधन जैसे प्रावधान जोड़े गए. इससे स्पष्ट है कि जल समझौतों को समय के साथ अद्यतन करना सामान्य प्रक्रिया है.
1960 में बनी सिंधु जल संधि में जलवायु परिवर्तन, भूजल प्रबंधन, जल गुणवत्ता, पर्यावरणीय प्रवाह और प्रदूषण नियंत्रण जैसे आधुनिक विषय शामिल नहीं हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आज इन पहलुओं को नजरअंदाज कर प्रभावी जल प्रबंधन संभव नहीं है. यही कारण है कि संधि में सुधार की मांग तेज हुई है.
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की संशोधन संबंधी मांग को केवल मौजूदा तनाव के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए. यदि दोनों देश बातचीत के जरिए नई परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था तैयार करते हैं, तो इससे जल प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकता है और लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को कम करने की दिशा में भी रास्ता निकल सकता है.