जब भारत के पानी रोकने पर पाकिस्तान में मच गई थी अफरा-तफरी, नेहरू ने कहा था- यह अमानवीय
1948 में भारत के पूर्वी पंजाब ने पाकिस्तान की ओर जाने वाली नहरों का पानी रोक दिया था. इस फैसले से लाहौर तक की नहरें सूख गईं. यही संकट आगे चलकर 1960 की सिंधु जल संधि की सबसे बड़ी वजह बना.
नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर तनातनी आज नई नहीं है. इसकी शुरुआत विभाजन के कुछ ही महीनों बाद हो गई थी. अप्रैल 1948 में पूर्वी पंजाब सरकार ने पाकिस्तान की ओर जाने वाली अहम नहरों का पानी रोक दिया. इस फैसले से पाकिस्तान के खेत सूखने लगे और लाहौर तक की नहरें खाली हो गईं. यह संकट इतना बड़ा था कि आखिरकार दोनों देशों को बातचीत की मेज पर आना पड़ा और बाद में इसी घटनाक्रम ने सिंधु जल संधि की नींव रखी.
1947 में देश के बंटवारे के बाद पंजाब की सिंचाई व्यवस्था दो देशों में बंट गई, लेकिन नहरों का पूरा ढांचा पहले जैसा ही रहा. भारत के हिस्से में माधोपुर और फिरोजपुर जैसे महत्वपूर्ण हेडवर्क्स आए, जिनसे पाकिस्तान के पंजाब की बड़ी कृषि भूमि तक पानी पहुंचता था. शुरुआती व्यवस्था के लिए दोनों देशों के बीच अस्थायी समझौता हुआ, जिसकी अवधि 31 मार्च 1948 तक थी.
समझौता खत्म होते ही रुक गया पानी
समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब के मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव की सरकार ने 1 अप्रैल 1948 को पाकिस्तान जाने वाली अपर बारी दोआब और दिपालपुर नहरों का पानी रोक दिया. राज्य सरकार का तर्क था कि उसके क्षेत्र से निकलने वाले जल संसाधनों पर उसका अधिकार है. हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस फैसले से सहमत नहीं थे और उन्होंने इसे कृषि के नजरिए से अमानवीय कदम बताया था.
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लाहौर तक दिखा संकट का असर
करीब पांच सप्ताह तक पानी बंद रहने का असर पाकिस्तान में तेजी से दिखाई दिया. खेत सूखने लगे और लाहौर की प्रसिद्ध नहर भी लगभग खाली हो गई. उस समय के आकलनों के अनुसार पाकिस्तान की लगभग 5.5 प्रतिशत खेती प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई थी. इस संकट ने पाकिस्तान को यह एहसास कराया कि पानी के मामले में उसकी निर्भरता भारत पर बहुत अधिक है.
युद्ध नहीं, बातचीत का रास्ता चुना
हालांकि दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर तनाव पहले से था, लेकिन पाकिस्तान ने पानी के मुद्दे पर युद्ध का रास्ता नहीं चुना. भारत की भौगोलिक बढ़त और नई परिस्थितियों को देखते हुए बातचीत को प्राथमिकता दी गई. मई 1948 में नई दिल्ली में हुई इंटर-डोमिनियन बैठक के बाद भारत ने दोबारा पानी छोड़ दिया और दोनों देशों के बीच स्थायी समाधान तलाशने की प्रक्रिया शुरू हुई.
यहीं से शुरू हुई सिंधु जल संधि की राह
1948 के इस संकट ने दोनों देशों को यह समझा दिया कि पानी का स्थायी प्रबंधन जरूरी है. इसके बाद कई वर्षों तक बातचीत चली और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए. यह समझौता दशकों तक दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार बना रहा. हालांकि हाल के वर्षों में बदलते हालात ने इस संधि को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है.