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India Daily

ट्रंप के लाख चाहने पर भी मॉस्को से छुटकारा नहीं पा सकता भारत, रूस में फंसे भारतीय तेल कंपनियों के 1.4 अरब डॉलर!

भारतीय सरकारी तेल कंपनियों के लगभग 1.4 अरब डॉलर के डिविडेंड रूस में फंसे हुए हैं. यह पैसा भारतीय कंपनियों की रूस में मौजूद तेल और गैस परियोजनाओं से मिला है, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से इसे भारत लाना असंभव हो गया है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
ट्रंप के लाख चाहने पर भी मॉस्को से छुटकारा नहीं पा सकता भारत, रूस में फंसे भारतीय तेल कंपनियों के 1.4 अरब डॉलर!
Courtesy: social media

भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पिछले दो दशकों में रूस की कई बड़ी तेल और गैस परियोजनाओं में भारी निवेश किया है. इन निवेशों से मिलने वाला डिविडेंड सुरक्षित तो है, लेकिन पिछले तीन साल से कंपनियां इस रकम को देश में वापस नहीं ला पा रही हैं. युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते बनी पेमेंट चैनल की बाधाएं इस समस्या का सबसे बड़ा कारण हैं.

जानकारी के अनुसार भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने रूस की विभिन्न परियोजनाओं में अब तक 6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है. इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी ओएनजीसी विदेश (OVL) की है, जो सखालिन-1 और वेंकोर परियोजना में हिस्सेदारी रखती है. अकेले OVL का करीब 400 मिलियन डॉलर का डिविडेंड रूस में फंसा है. 

ये कंपनियां भी शामिल

वहीं, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), ऑयल इंडिया (OIL) और भारत पेट्रोलियम की सहायक कंपनी बीपीआरएल के कंसोर्टियम का हिस्सा करीब 1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. यह निवेश भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने की रणनीति का हिस्सा रहा है, लेकिन मौजूदा हालात ने इसे चुनौती बना दिया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध और पेमेंट चैनल की रुकावट

फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से हालात और जटिल हो गए. कई प्रमुख रूसी बैंकों को SWIFT सिस्टम से बाहर कर दिया गया, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय भुगतान क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई. इसके अलावा, रूस ने अमेरिकी डॉलर की बाहर निकासी पर रोक लगा दी. 

भारतीय कंपनियों का डिविडेंड अब मॉस्को स्थित कमर्शियल इंडो बैंक लिमिटेड (CIBL) में जमा है, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की सहयोगी संस्था है. यह रकम रूबल में पड़ी है, लेकिन इसे भारत लाना या किसी और तरह से इस्तेमाल करना संभव नहीं हो रहा.

देश के भीतर विकल्प तलाशने की कोशिश

कंपनियों और सरकार ने कोशिश की कि इस रकम को रूस के भीतर ही इस्तेमाल किया जाए. जैसे नई परियोजनाओं में निवेश करना या मौजूदा प्रोजेक्ट्स पर खर्च करना. लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर परियोजनाएं अब अपने बड़े पूंजीगत खर्च (capital expenditure) के दौर से गुजर चुकी हैं, और किसी नए भारी निवेश की संभावना नहीं है.

अपवाद सिर्फ OVL का मामला है, जिसे सखालिन-1 प्रोजेक्ट में शेयरधारक बने रहने के लिए करीब 600 मिलियन डॉलर का भुगतान करना है. कंपनी चाहती है कि इस फंसी रकम से वह भुगतान कर सके, लेकिन डॉलर पेमेंट से जुड़ी जटिलताओं की वजह से मामला अटक गया है.

तेल भुगतान से जोड़ने की जटिलता

सबसे आसान विकल्प यह लग सकता था कि रूस से आयात किए जाने वाले तेल की पेमेंट इन्हीं डिविडेंड्स से की जाए. लेकिन इसमें भी कई कानूनी और तकनीकी बाधाएं हैं. IOC और BPCL तो रूस से तेल खरीदते हैं, पर OVL और OIL ऐसा नहीं करते. इसके अलावा, इन निवेशों को खास स्पेशल पर्पस व्हीकल्स (SPVs) के जरिये किया गया था, जो सिंगापुर जैसे देशों में पंजीकृत हैं. ऐसे में अगर इस रकम का इस्तेमाल तेल भुगतान के लिए होता है, तो यह केवल भारत और रूस ही नहीं बल्कि तीसरे देशों के अधिकार क्षेत्र में भी आ जाएगा. पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के बीच यह रास्ता बेहद पेचीदा हो जाता है.

क्या है आगे का रास्ता?

मामला लगातार भारत और रूस की सरकारों के बीच बातचीत में उठाया जा रहा है, लेकिन कोई ठोस हल निकलना आसान नहीं है. जानकार मानते हैं कि जब तक रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म नहीं होता और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों में ढील नहीं आती, तब तक इस रकम को भारत लाना लगभग असंभव है. भारतीय कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय अकाउंटिंग और कानूनी विशेषज्ञों की मदद ले रही हैं ताकि कोई वैकल्पिक रास्ता निकाला जा सके. लेकिन सच यह है कि फिलहाल इन 1.4 अरब डॉलर की रकम का इस्तेमाल भारत के बाहर नहीं किया जा सकता.