अमेरिकी सांसद राइली मूर ने FCRA के प्रस्तावित संशोधनों को ईसाइयों पर हमला और इसे भारत-अमेरिका के रिश्तों के लिए सबसे बड़ी चिंता बताया है. वहीं विपक्ष भी एफसीआरए का कड़ा विरोध कर रहा है.
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010. इसका उद्देश्य विदेश से आने वाले चंदे या आर्थिक योगदान को नियंत्रित करना है, ताकि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा के खिलाफ न हो. FCRA के तहत NGO, ट्रस्ट, सोसायटी और अन्य पात्र संस्थाओं को विदेशी योगदान लेने के लिए पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेनी होती है.
2010 के कानून में FCRA पंजीकरण की अवधि पांच वर्ष की गई थी. 2020 के संशोधन में विदेशी धन को दूसरी संस्थाओं को ट्रांसफर करने पर रोक, प्रशासनिक खर्च की सीमा 20% और SBI की दिल्ली स्थित मुख्य शाखा के जरिए विदेशी योगदान लेने जैसी व्यवस्थाएं लाई गई थीं. 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के इन कड़े प्रावधानों को संवैधानिक रूप से वैध माना था.
2026 का FCRA Amendment Bill आखिर क्या बदलना चाहता है?
इस बिल का सबसे बड़ा बदलाव विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों को लेकर है.
1. नया 'Designated Authority'
बिल एक Designated Authority बनाने का प्रस्ताव करता है. यदि किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संगठन खुद उसे सरेंडर कर देता है या उसका प्रमाणपत्र समाप्त हो जाता है, तो उसके विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियां इस प्राधिकरण के पास अस्थायी रूप से निहित हो सकती हैं.
मसलन, किसी NGO ने विदेशी चंदे से अस्पताल बनाया है और बाद में उसका FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है. प्रस्तावित व्यवस्था में उस अस्पताल पर Designated Authority का नियंत्रण आ सकता है.
2. संपत्ति का स्थायी हस्तांतरण भी संभव
अगर संगठन निर्धारित अवधि में नया FCRA प्रमाणपत्र हासिल नहीं कर पाता या उसका पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियां स्थायी रूप से Designated Authority में निहित हो सकती हैं. इसके बाद इन्हें सरकार के किसी विभाग या स्थानीय प्राधिकरण को दिया जा सकता है या बेचा जा सकता है. बिक्री से प्राप्त राशि और अप्रयुक्त विदेशी धन को Consolidated Fund of India में जमा करने का प्रावधान है.
3. मिश्रित पैसे से बनी संपत्ति पर भी असर
यह सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रावधानों में से एक है. बिल कहता है कि यदि कोई संपत्ति आंशिक रूप से विदेशी चंदे और आंशिक रूप से घरेलू स्रोत से बनी है, तो भी पूरी संपत्ति Designated Authority में निहित हो सकती है. हालांकि संस्था अलग से यह दावा कर सकती है कि घरेलू धन से बनी पहचान योग्य हिस्सेदारी उसे वापस की जाए.
यही प्रावधान बड़े अस्पतालों, स्कूलों, रिसर्च सेंटरों और सामाजिक संस्थाओं के लिए सबसे बड़ा सवाल पैदा करता है.
सरकार इसके पक्ष में क्या तर्क दे रही है?
सरकार का मूल तर्क है कि विदेशी पैसा सामान्य घरेलू दान जैसा नहीं है. विदेशी स्रोत से आने वाले धन के जरिए किसी देश की सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना रहती है. इसी कारण सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जोड़ती है.
सरकार के मुताबिक मौजूदा FCRA की धारा 15 में विदेशी चंदे से बनी संपत्ति को पंजीकरण रद्द होने के बाद प्राधिकरण के पास रखने का सिद्धांत पहले से मौजूद है. समस्या यह है कि पुरानी व्यवस्था में ऐसी संपत्तियों को कब्जे में लेने, संभालने और अंतिम रूप से निपटाने की विस्तृत प्रक्रिया नहीं थी. नए बिल का उद्देश्य इसी "legal gap" को खत्म करना है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक पिछले करीब एक दशक में लगभग 22,000 FCRA पंजीकरण रद्द हुए और करीब 15,000 पंजीकरण समाप्त माने गए. सरकार का कहना है कि हजारों करोड़ रुपये की विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर पुरानी व्यवस्था में अनिश्चितता थी.
सरकार यह भी कह रही है कि संपत्ति तुरंत स्थायी रूप से जब्त नहीं होगी. पहले उसका provisional vesting होगा. यदि NGO निर्धारित समय में अपना FCRA पंजीकरण बहाल करा लेता है तो संपत्ति और अप्रयुक्त विदेशी धन वापस किया जाएगा.
बिल के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क क्या हैं?
1. विदेशी धन की जवाबदेही बढ़ेगी
यदि किसी संगठन को विदेशी स्रोतों से पैसा मिलता है तो उस पैसे और उससे बनी संपत्ति का अंतिम उपयोग स्पष्ट होना जरूरी है. सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था जवाबदेही मजबूत करेगी.
2. फर्जी या निष्क्रिय संस्थाओं पर लगाम
ऐसी संस्था जिसका FCRA प्रमाणपत्र समाप्त हो चुका है लेकिन उसने विदेशी पैसे से संपत्ति बना रखी है, उसके मामले में पुरानी व्यवस्था में लंबा कानूनी और प्रशासनिक गतिरोध हो सकता था. नया कानून इस स्थिति का अंतिम समाधान देने की कोशिश करता है.
3. राष्ट्रीय सुरक्षा
भारत की सुरक्षा व्यवस्था का तर्क है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल केवल घोषित सामाजिक या धार्मिक उद्देश्य के लिए होना चाहिए. यदि धन का इस्तेमाल राजनीतिक प्रभाव, अवैध गतिविधियों या अन्य राष्ट्रीय हित-विरोधी कामों में हो, तो सरकार के पास कार्रवाई की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए.
4. सजा में नरमी भी
एक दिलचस्प पहलू यह है कि बिल केवल सख्ती नहीं बढ़ाता. मौजूदा कानून में अपराध के लिए अधिकतम पांच साल तक की जेल का प्रावधान है, जिसे बिल एक साल तक करने का प्रस्ताव करता है. साथ ही किसी FCRA अपराध की जांच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति का प्रस्ताव है.
बिल के खिलाफ सबसे बड़ी आपत्तियां क्या हैं?
1. सरकार को संपत्ति पर बहुत ज्यादा शक्ति मिलने का डर
PRS Legislative Research ने भी इसे बिल का प्रमुख मुद्दा माना है. उसके विश्लेषण के अनुसार, FCRA प्रमाणपत्र का नवीनीकरण नहीं होने पर विदेशी धन से बनाई गई पुरानी संपत्तियां भी Designated Authority में निहित हो सकती हैं.
आलोचकों का सवाल है कि FCRA लाइसेंस का खत्म होना हमेशा वित्तीय अपराध साबित होने के बराबर नहीं है. कोई संस्था समय पर renewal नहीं करा पाई या renewal खारिज हो गया, तो क्या उससे वर्षों पहले विदेशी दान से बनाया गया अस्पताल या स्कूल भी सरकार के नियंत्रण में जाना चाहिए?
यह सवाल खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिल में cancellation, surrender और non-renewal—तीनों परिस्थितियों को asset vesting से जोड़ा गया है.
2. न्यायिक सुरक्षा को लेकर चिंता
बिल Designated Authority को संपत्ति पर प्रशासनिक नियंत्रण की शक्ति देता है और बाद में उसके आदेश के खिलाफ 90 दिनों के भीतर District Judge के पास अपील का रास्ता देता है.
लेकिन आलोचकों का तर्क है कि पहले संपत्ति पर नियंत्रण और बाद में न्यायिक चुनौती का मॉडल किसी संस्था के लिए गंभीर नुकसान पैदा कर सकता है.
ICNL ने इसी बिंदु पर कहा है कि संपत्ति पर प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए नियंत्रण लिया जा सकता है और इसके लिए पहले से न्यायिक फैसला जरूरी नहीं है. उसके अनुसार इससे due process और property rights से जुड़े सवाल पैदा होते हैं.
NGOs और सामाजिक क्षेत्र पर क्या असर होगा?
यह बिल सबसे ज्यादा विदेशी फंड पर निर्भर NGOs, charities, hospitals, schools, religious organisations और research institutions को प्रभावित कर सकता है.
भारत में 15 जुलाई 2026 तक 14,449 सक्रिय FCRA certificates, 22,498 cancelled certificates और 15,212 deemed-expired certificates थे. यानी यह केवल सैद्धांतिक मुद्दा नहीं है; बड़ी संख्या में संस्थाएं FCRA व्यवस्था के दायरे में आती हैं.
सकारात्मक असर
नकारात्मक असर
धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर असर
यह बिल राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा इसी कारण विवादित हुआ है.
सरकार का कहना है कि बिल किसी धर्म विशेष को निशाना नहीं बनाता. नए नियमों में permissible religious purposes को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है और सरकार ने कहा है कि ये प्रावधान सभी faith-based organisations पर समान रूप से लागू होंगे.
वहीं Catholic Bishops' Conference of India सहित कुछ धार्मिक संगठनों ने आशंका जताई है कि विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और charitable institutions की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है.
हालांकि बिल में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा है- यदि स्थायी रूप से निहित संपत्ति पूरी या आंशिक रूप से place of worship है, तो Designated Authority को उसका धार्मिक चरित्र बनाए रखना होगा.
बता दें कि FCRA Amendment Bill, 2026 अभी कानून नहीं बना है. इसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और फिलहाल संसद में लंबित है. दूसरी ओर, FCRA Amendment Rules, 2026 को 22 जून 2026 को अधिसूचित किया जा चुका है और वे लागू हैं. इसलिए बिल और नए नियमों को अलग-अलग समझना जरूरी है.