भारत में मदरसों का रजिस्ट्रेशन और मान्यता कैसे होती है? जानिए क्या हैं नियम

भारत में मदरसा शिक्षा मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है. मदरसे को कानूनी रूप देने के लिए सोसाइटी, ट्रस्ट या सेक्शन 8 कंपनी के तौर पर पंजीकरण कराया जा सकता है.

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Shanu Sharma

भारत में किसी मदरसे को संचालित करने के लिए सबसे पहले उसे एक कानूनी संस्था के तौर पर पंजीकृत कराना होता है. इसके लिए संस्था सोसाइटी के रूप में रजिस्टर हो सकती है, ट्रस्ट बनाया जा सकता है या सेक्शन 8 कंपनी के जरिए इसका संचालन किया जा सकता है.

रजिस्ट्रेशन के बिना संस्था के लिए कानूनी तौर पर काम करना मुश्किल होता है. इसके अलावा बैंक खाता खोलने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी परेशानी आती है.

रजिस्ट्रेशन और मान्यता में क्या अंतर?

मदरसे के रजिस्ट्रेशन और शैक्षणिक मान्यता को एक ही प्रक्रिया नहीं माना जाता. रजिस्ट्रेशन से संस्था को कानूनी पहचान मिलती है, जबकि मान्यता का संबंध वहां दी जाने वाली शिक्षा, पाठ्यक्रम और परीक्षाओं से होता है. कई राज्यों में मदरसा शिक्षा बोर्ड या संबंधित सरकारी संस्था मान्यता देने का काम करती है. उत्तर प्रदेश में यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 के तहत संचालित होती है.


उत्तर प्रदेश के मदरसा कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में महत्वपूर्ण फैसला दिया था. अदालत ने राज्य को मदरसों में शिक्षा का स्तर, पाठ्यक्रम और परीक्षाओं से जुड़े नियम तय करने का अधिकार माना. हालांकि, कामिल और फाजिल जैसी उच्च डिग्रियों को विश्वविद्यालय स्तर की डिग्री के तौर पर मान्यता देने वाले प्रावधान को यूजीसी कानून के अनुरूप नहीं माना गया. इस हिस्से को अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था.

बिना मान्यता वाला मदरसा बंद करना जरूरी नहीं

जनवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मदरसों को लेकर एक और महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की. अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता कि उसके पास शैक्षणिक मान्यता नहीं है. हालांकि, बिना मान्यता वाले मदरसों को सरकारी अनुदान, बोर्ड की परीक्षाओं में शामिल होने की सुविधा या वहां से हासिल डिग्री की सरकारी मान्यता नहीं मिलती.उत्तर प्रदेश में 2017 से मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए मदरसा पोर्टल पर पंजीकरण की व्यवस्था लागू है. इसका उद्देश्य संस्थानों की जानकारी को व्यवस्थित करना और व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना है. 

दूसरे राज्यों में अलग व्यवस्था

मदरसों के लिए नियम हर राज्य में एक जैसे नहीं हैं. उत्तराखंड में पुराने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था की गई है और राज्य शिक्षा बोर्ड से जुड़ाव जरूरी किया गया है. पश्चिम बंगाल में भी अनिवार्य पंजीकरण और निरीक्षण से संबंधित प्रस्ताव सामने आया है.