हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है, लेकिन हिंदी का सफर सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि वाली हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था. इसके बाद हिंदी के प्रचार-प्रसार ने नई गति पकड़ी. समय के साथ लिखने के तरीके भी लगातार बदले. कभी कलम और कागज का दौर था, फिर टाइपराइटर आया और आज लोग मोबाइल पर बोलकर हिंदी लिख रहे हैं.
हिंदी का मौजूदा रूप अचानक तैयार नहीं हुआ. इसकी जड़ें भारतीय आर्य भाषा परिवार से जुड़ी मानी जाती हैं. संस्कृत से प्राकृत और फिर अपभ्रंश के रास्ते कई भाषाई रूप सामने आए. शौरसेनी अपभ्रंश का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा. करीब दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच हिंदी का शुरुआती स्वरूप दिखने लगा. आगे ब्रज, अवधी, भोजपुरी और दूसरी बोलियों का विकास हुआ. खड़ी बोली ने आधुनिक मानक हिंदी की नींव मजबूत की.
कबीर, सूरदास और तुलसीदास जैसे रचनाकारों ने हिंदी को आम लोगों की भाषा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. भक्ति काल में रचनाएं ऐसी भाषाओं में हुईं, जिन्हें सामान्य लोग आसानी से समझ सकते थे. बाद में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पत्रकारिता और साहित्य के जरिए आधुनिक हिंदी को मजबूती दी. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लेखन को नया अनुशासन दिया, जबकि प्रेमचंद ने आम जीवन और समाज की समस्याओं को सरल भाषा में सामने रखा.
तकनीक ने हिंदी लिखने का तरीका पूरी तरह बदल दिया. देवनागरी टाइपराइटर आने के बाद कार्यालयों में पत्र और दस्तावेज तेजी से तैयार होने लगे, हालांकि इसकी कुंजियां सीखना आसान नहीं था. कंप्यूटर के शुरुआती दौर में अलग-अलग फॉन्ट और कोडिंग की परेशानी रही. यूनिकोड ने हिंदी को डिजिटल दुनिया में ज्यादा स्थिर बनाया. इसके साथ इनस्क्रिप्ट ने भारतीय भाषाओं के लिए मानक की-बोर्ड व्यवस्था दी, जिसका इस्तेमाल पेशेवर लेखन में भी होता है.
मोबाइल ने हिंदी टाइपिंग को घर-घर पहुंचाया. फोनेटिक की-बोर्ड में लोग अंग्रेजी अक्षरों से हिंदी शब्द लिखने लगे, जिससे देवनागरी कुंजियां याद करने की जरूरत कम हुई. अब वॉइस टाइपिंग ने यह काम और सरल कर दिया है. बोलते ही शब्द स्क्रीन पर आने लगते हैं. इससे संदेश, नोट और सोशल मीडिया पोस्ट तैयार करना आसान हुआ है. हालांकि उच्चारण, विराम और स्थानीय बोलियों के कारण कभी-कभी तकनीक गलत शब्द भी दर्ज कर देती है.