देश में हर साल लाखों लोग सड़क हादसों, आग, फैक्ट्री दुर्घटनाओं और दूसरी आपात स्थितियों में जान गंवा देते हैं. इनमें कई मौतें सिर्फ इसलिए हो जाती हैं क्योंकि घायल व्यक्ति को समय पर इलाज नहीं मिल पाता. इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कहा है कि ट्रॉमा केयर केवल स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन के अधिकार का जरूरी हिस्सा है. इस फैसले को आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी घायल व्यक्ति को समय पर इलाज मिलना सरकार की जिम्मेदारी है. अदालत ने साफ किया कि इमरजेंसी मेडिकल सुविधा सिर्फ सड़क हादसों तक सीमित नहीं रहेगी. अब गिरने, जलने, डूबने, आग लगने, फैक्ट्री दुर्घटनाओं, विस्फोट और प्राकृतिक आपदाओं में घायल लोगों को भी तुरंत इलाज उपलब्ध कराना होगा. कोर्ट ने माना कि देश में अभी भी इमरजेंसी हेल्थ सिस्टम कई जगह कमजोर है और इसी वजह से कई लोग इलाज के इंतजार में दम तोड़ देते हैं. अदालत ने कहा कि जीवन बचाने के लिए तेज और मजबूत मेडिकल व्यवस्था जरूरी है. यह फैसला सीधे तौर पर उन लाखों परिवारों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है जो समय पर इलाज न मिलने की समस्या से जूझते रहे हैं.
अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई बड़े निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि अगले तीन महीने के भीतर 100, 101, 102, 108 और 1033 जैसे सभी इमरजेंसी नंबरों को 112 हेल्पलाइन से जोड़ा जाए. इसके अलावा सरकारी और निजी एम्बुलेंस में AIS-125 मानक, GPS और ट्रैकिंग सिस्टम अनिवार्य किए जाएंगे. अदालत ने यह भी कहा कि हादसों में घायलों की मदद करने वाले लोगों को पुलिस या कानूनी परेशानियों से बचाने के लिए शिकायत निवारण प्रणाली बनाई जाए. राज्यों को अपनी ट्रॉमा रजिस्ट्री तैयार करने और अस्पतालों की ट्रॉमा सुविधाओं के आधार पर ग्रेडिंग करने का भी आदेश दिया गया है. इससे मरीजों को सही अस्पताल तक जल्दी पहुंचाने में मदद मिलेगी.
देश में लगातार बढ़ रहे हादसों के आंकड़े सरकार और अदालत दोनों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं. NCRB के अनुसार, साल 2023 में करीब 4.4 लाख लोगों की अलग-अलग हादसों में मौत हुई थी. इनमें लगभग 1.7 लाख मौतें सड़क दुर्घटनाओं में दर्ज की गईं. इसका मतलब है कि हर दिन औसतन 1,217 लोगों ने हादसों में अपनी जान गंवाई. लॉ कमीशन का मानना है कि अगर घायलों को समय पर इलाज मिल जाए तो इनमें से लगभग आधे लोगों की जान बचाई जा सकती है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इमरजेंसी मेडिकल सिस्टम को मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया है. अदालत का कहना है कि इलाज में देरी किसी भी नागरिक के जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा आम लोगों को मिलने वाला है. अब हादसे के बाद अस्पतालों और एम्बुलेंस सेवाओं की जवाबदेही पहले से ज्यादा बढ़ जाएगी. केंद्र सरकार की PM RAHAT कैशलेस इलाज योजना को भी राज्यों के अस्पतालों में लागू करने के निर्देश दिए गए हैं. इससे सड़क हादसों के पीड़ितों को शुरुआती इलाज के लिए पैसे की चिंता कम होगी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन निर्देशों को सही तरीके से लागू किया गया तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है. यह फैसला सिर्फ कानूनी आदेश नहीं, बल्कि देश के स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.