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लोक सेवकों के खिलाफ मामले का संज्ञान लेने के लिए पूर्व अनुमति जरूरी, जानें क्यों कहां दिल्ली हाई कोर्ट ने

न्यायमूर्ति नीना कृष्ण बंसल ने यह आदेश उस मामले में पारित किया, जिसमें कथित रूप से लापरवाही से मौत का कारण बनने के आरोप में लोक सेवकों - याचिकाकर्ता, एक एमसीडी स्कूल के प्राचार्य और एक जूनियर इंजीनियर ठेकेदार - के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देर से दी गई थी.

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Edited By: Reepu Kumari
लोक सेवकों के खिलाफ मामले का संज्ञान लेने के लिए पूर्व अनुमति जरूरी, जानें क्यों कहां दिल्ली हाई कोर्ट ने
Courtesy: Pinteres

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि लोक सेवकों के खिलाफ मामले का अदालत द्वारा संज्ञान लिये जाने से पहले अभियोजन एजेंसी को सक्षम प्राधिकार से मंजूरी लेनी होगी और उसके बाद कोई भी मंजूरी निरर्थक होगी.

न्यायमूर्ति नीना कृष्ण बंसल ने यह आदेश उस मामले में पारित किया, जिसमें कथित रूप से लापरवाही से मौत का कारण बनने के आरोप में लोक सेवकों - याचिकाकर्ता, एक एमसीडी स्कूल के प्राचार्य और एक जूनियर इंजीनियर ठेकेदार - के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देर से दी गई थी.

कार्यवाही बंद

अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी और उसे यह कहते हुए मामले में आरोप मुक्त कर दिया कि कानून के तहत पूर्व मंजूरी के मुद्दे पर स्थापित कानून है.

अदालत ने 17 जनवरी को कहा, 'संज्ञान लेने से पहले (सक्षम प्राधिकार से) मंजूरी लेनी होती है. बाद में मंजूरी लेने से दोष दूर नहीं होता. परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही बंद करने के आवेदन को स्वीकार किया जाता है और उसे अभियोजन पक्ष को उचित कार्रवाई करने की स्वतंत्रता देते हुए आरोप मुक्त किया जाता है.'

सेप्टिक टैंक में चार वर्षीय बच्चे की डूबने से हुई मौत

वर्ष 2016 में कथित लापरवाही के कारण स्कूल के सेप्टिक टैंक में चार वर्षीय बच्चे की डूबने से हुई मौत के बाद दिल्ली पुलिस ने आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी.

प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए (लापरवाही के कारण मौत) सहित अन्य प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी.

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता ध्रुव गुप्ता ने किया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोपपत्र पांच जुलाई, 2016 को निचली अदालत में दायर किया गया था और उस समय सक्षम प्राधिकारी से किसी भी मंजूरी के बिना संज्ञान लिया गया था.

तर्क दिया गया

याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि निचली अदालत द्वारा लिया गया संज्ञान कानून की दृष्टि से गलत था और याचिकाकर्ता को आरोपमुक्त किया जाना चाहिए तथा यदि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई आरोपपत्र दाखिल किया जाता है, तो उसे विलंब को माफ करने के लिए आवेदन के साथ समर्थित किया जाना चाहिए.

अदालत ने आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि यदि विलम्ब को माफ करने के लिए कोई आवेदन दायर किया जाता है, तो उस पर निचली अदालत द्वारा कानून के अनुसार विचार करेगी.

अदालत ने आगे कहा कि अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा कानून के अनुसार जारी रहना चाहिए.

(इस खबर को इंडिया डेली लाइव की टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की हुई है)