नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नया UGC बिल 2026 इन दिनों चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ. पूरे देश के शिक्षा जगत में इसने तूफान मचा रखा है. एक तरफ सरकार इसे भारतीय उच्च शिक्षा में सुधार का मास्टरस्ट्रोक बता रही है. वहीं शिक्षक, छात्र संगठन और कई शिक्षाविद इसे सरकारी नियंत्रण और शिक्षा के निजीकरण की साजिश करार दे रहे हैं. साथ ही इसका सबसे ज्यादा प्रर्दशन बिहार में हो रहा है.
पटना से हाजीपुर तक इसके खिलाफ अलग-अलग संगठन सड़क और सोशल मीडिया पर विरोध जता रहे हैं. कई बड़े नेताओं का इस पर बयान भी आया है. वहीं सर्वण समाज में विरोध की लहर दिख रही है. सरकार के खिलाफ लोग खड़े हो रहे हैं. बिहार-झारखंड में भी अलग-अलग संगठनों ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया है. सामान्य वर्ग छात्र तो इसे दूसरा SC ST एक्ट मान रहा है. आईए जानते हैं कि यह बिल क्या है और इससे क्या असर पड़ेगा.
यह नया बिल मौजूदा UGC अधिनियम 1956 की जगह लेगा. इसका मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा को अधिक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और जवाबदेह बनाना है. मौजूदा UGC की जगह एक नए उच्च शिक्षा आयोग यानी HECI का गठन होगा. HECI सिर्फ अकादमिक रेगुलेशन पर ध्यान देगा, जबकि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को फंडिंग का काम सीधे मंत्रालय या किसी और संस्था को दिया जा सकता है. बिल में शिक्षण के मानकों, कोर्स के डिजाइन और छात्रों के सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया है. सरकार का कहना है कि यह विश्वविद्यालयों को ज्यादा स्वायत्तता देगा.
नए UGC बिल 2026 का सवर्ण समाज द्वारा विरोध मुख्य रूप से उच्च शिक्षा में बढ़ती फीस और योग्यता की अनदेखी की आशंकाओं पर टिका है. सवर्ण संगठनों का मानना है कि नए HECI के गठन से यदि सरकारी फंडिंग कम होती है, तो निजीकरण और फीस वृद्धि का सबसे बड़ा आर्थिक बोझ सामान्य वर्ग के मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ेगा, जिन्हें अन्य वर्गों की तरह बड़ी छात्रवृत्तियां नहीं मिलतीं. साथ ही सर्वण समाज का कहना है कि उनके युवओं के लिए अवसर और भी सीमित हो जाएंगे. साथ ही इस बिल से सर्वण समाज के छात्रों को निशाना भी बनाया जा सकता है.
पूरे देश में शिक्षक संगठन जैसे AIFUCTO, छात्र यूनियनें जैसे AISF, SFI, ABVP के कुछ गुटों ने भी और कई विश्वविद्यालय के कुलपति (VC) इस बिल का विरोध कर रहे हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे बड़े संस्थानों में नियमित विरोध प्रदर्शन और बहस चल रही है. वहीं इस बिल को लेकर सबसे ज्यादा फजीहत बिहार NDA के नेता से लेकर मंत्री तक झेल रहे हैं. गुस्सा खासतौर पर बीजेपी के सवर्ण नेताओं-मंत्रियों पर है. वहीं बीजेपी के ही कई नेता खुलेआम सोशल मीडिया पर इस बिल का विरोध कर रहे हैं.