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India Daily

प्रेमचंद से लेकर माखनलाल तक.....जब कलम से कांप उठी थी ब्रिटिश हुकूमत; जानिए जेल और जुल्म की अनसुनी कहानी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई लेखकों और पत्रकारों ने अपनी लेखनी से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी. उनकी किताबें जब्त की गईं, अखबारों पर प्रतिबंध लगा और उन्हें जेल व अमानवीय यातनाओं का भी सामना करना पड़ा.

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प्रेमचंद से लेकर माखनलाल तक.....जब कलम से कांप उठी थी ब्रिटिश हुकूमत; जानिए जेल और जुल्म की अनसुनी कहानी
Courtesy: AI Generated

नई दिल्ली: भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार, बंदूक और आंदोलनों तक सीमित नहीं था. इस लड़ाई का एक बड़ा मोर्चा लेखनी ने भी संभाला. उस दौर में कई भारतीय लेखक, कवि और पत्रकार अपनी रचनाओं के जरिए लोगों में आजादी की अलख जगा रहे थे. उनके लेख, कविताएं और अखबार अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनमत तैयार कर रहे थे. यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार ने ऐसे लेखकों को अपना सबसे बड़ा वैचारिक विरोधी मान लिया. कई लेखकों की किताबें जब्त कर ली गईं, अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उन्हें जेलों में अमानवीय यातनाएं तक झेलनी पड़ीं.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभर में कई लेखक और पत्रकार अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ जागरूक कर रहे थे. उनकी लिखी कविताएं, लेख और संपादकीय गांव-गांव तक पहुंचते थे और लोगों के भीतर स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करते थे. अंग्रेजी सरकार को डर था कि यदि इन विचारों को नहीं रोका गया, तो आंदोलन और अधिक व्यापक हो जाएगा.

1908 से 1940 के बीच ब्रिटिश सरकार ने हजारों भारतीय प्रकाशनों पर कार्रवाई की. अनेक किताबें जब्त कर ली गईं, कई पैम्फलेटों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और कई समाचार पत्रों के अंक प्रकाशित होने से पहले ही रोक दिए गए. इन प्रकाशनों में अंग्रेजी शासन की आलोचना, स्वदेशी आंदोलन, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की मांग जैसे विषय प्रमुख थे.

ब्रिटिश प्रशासन का मानना था कि ऐसे लेखन से लोगों में सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ेगा और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ताकत मिलेगी.

प्रेस पर रखा जाता था कड़ा नियंत्रण

ब्रिटिश शासन ने प्रेस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए कई कानून लागू किए. प्रकाशकों से सुरक्षा राशि जमा कराने, छापाखानों की निगरानी करने और किसी भी प्रकाशन को जब्त करने जैसी शक्तियां प्रशासन के पास थीं.

अगर किसी अखबार या पुस्तक में सरकार को आपत्तिजनक सामग्री दिखाई देती, तो उसे तुरंत जब्त कर लिया जाता था. कई बार बिना मुकदमे के ही प्रतियां नष्ट कर दी जाती थीं.

गणेश शंकर विद्यार्थी: पत्रकारिता को बनाया आंदोलन का हथियार

गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र 'प्रताप' के जरिए ब्रिटिश शासन की नीतियों की लगातार आलोचना की. उनके लेख आम जनता और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम करते थे. अंग्रेज सरकार ने उन पर कई मुकदमे चलाए और उन्हें कई बार जेल भेजा, लेकिन उन्होंने अपनी लेखनी नहीं रोकी.

ganesh shankar vidyarthi

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बाल गंगाधर तिलक: कलम के कारण मिली छह साल की सजा

बाल गंगाधर तिलक ने 'केसरी' और 'मराठा' समाचार पत्रों के माध्यम से स्वराज का संदेश पूरे देश में पहुंचाया. उनके लेखों को अंग्रेज सरकार ने राजद्रोह माना. वर्ष 1908 में उन्हें छह साल की सजा देकर बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया. जेल में रहते हुए उन्होंने 'गीता रहस्य' जैसी महत्वपूर्ण कृति लिखी.

Bal Gangadhar Tilak

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माखनलाल चतुर्वेदी: कविता बनी आजादी की आवाज

प्रसिद्ध कवि और पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी कविताओं और लेखों के जरिए युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाई. उन्होंने 'कर्मवीर' और 'प्रभा' जैसे पत्रों का संपादन किया. उनकी गतिविधियों से परेशान अंग्रेज सरकार ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया. उनकी प्रसिद्ध कविता 'पुष्प की अभिलाषा' आज भी देशभक्ति का प्रतीक मानी जाती है.

Makhanlal Chaturvedi

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राम प्रसाद बिस्मिल: क्रांति के साथ साहित्य का भी योगदान

राम प्रसाद बिस्मिल केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली लेखक और कवि भी थे. उन्होंने कई पुस्तकों का लेखन और अनुवाद किया. काकोरी कांड के बाद जेल में रहते हुए उन्होंने कठिन यातनाएं झेलीं. फांसी से पहले लिखी गई उनकी आत्मकथा स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है.

ram prasad bismil

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यशपाल और अज्ञेय ने भी झेली ब्रिटिश जेल

प्रसिद्ध लेखक यशपाल क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे. अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लंबी कैद की सजा दी. वहीं, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' भी युवावस्था में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे. उन्हें भी ब्रिटिश सरकार ने जेल में रखा, जहां उन्होंने लेखन जारी रखा.

Yashpal

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Writer Agyeya

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दक्षिण भारत में सुब्रमण्यम भारती की लेखनी से बढ़ी राष्ट्रीय चेतना

तमिल भाषा के महान कवि सुब्रमण्यम भारती की कविताओं ने दक्षिण भारत में स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी. अंग्रेज सरकार उनकी लोकप्रियता से चिंतित रहती थी. सरकारी कार्रवाई से बचने के लिए उन्हें लंबे समय तक पांडिचेरी में रहना पड़ा, जहां से उन्होंने राष्ट्रवादी लेखन जारी रखा.

C. Subramania Bharati

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मौलाना आजाद के अखबारों पर लगाया गया प्रतिबंध

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 'अल-हिलाल' और 'अल-बलाग़' जैसे अखबारों के माध्यम से अंग्रेजी शासन के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी. उनके लेखों का व्यापक प्रभाव देखकर ब्रिटिश सरकार ने दोनों अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया. उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और लंबे समय तक नजरबंद भी रखा गया.

Maulana Azad

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प्रेमचंद की किताब तक कर दी गई जब्त

हिंदी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की शुरुआती देशभक्ति पर आधारित पुस्तक 'सोज़-ए-वतन' को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया. इसकी प्रतियां नष्ट कर दी गईं और उन्हें आगे अलग नाम से लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह घटना बताती है कि अंग्रेज सरकार साहित्य की ताकत से कितनी भयभीत थी.

Premchand

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शचीन्द्रनाथ सान्याल: 'बंदी जीवन' में दर्ज हैं यातनाओं की कहानी

क्रांतिकारी और लेखक शचीन्द्रनाथ सान्याल को ब्रिटिश सरकार ने दो बार 'काला पानी' की सजा दी. सेल्युलर जेल में उन्होंने अमानवीय यातनाएं झेलीं, लेकिन संघर्ष नहीं छोड़ा. उनकी पुस्तक 'बंदी जीवन' आज भी स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.

Sachindra Nath Sanyal

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विचारों से डरती थी अंग्रेजी हुकूमत

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इन लेखकों का योगदान यह साबित करता है कि अंग्रेजों को केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी चुनौती मिली थी. यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने अनेक किताबों पर प्रतिबंध लगाया, समाचार पत्र बंद करवाए और लेखकों को जेल में डाल दिया. इन साहित्यकारों ने अपनी कलम से ऐसी चेतना जगाई, जिसने आजादी की लड़ाई को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.