भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार, बंदूक और आंदोलनों की कहानी नहीं है. यह उन गीतों और नारों की भी कहानी है, जिन्होंने करोड़ों भारतीयों के मन में आजादी की लौ जलाई. यही वजह थी कि अंग्रेजी हुकूमत ने कई ऐसे गीतों, नारों और क्रांतिकारी साहित्य को अपने शासन के लिए खतरा मान लिया. कई जगह इन पर औपचारिक प्रतिबंध लगाए गए, तो कई स्थानों पर इन्हें गाने, बोलने या छापने वालों पर मुकदमे दर्ज किए गए, गिरफ्तारियां हुईं और लाठीचार्ज तक किया गया.
इतिहास की दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजों को इन गीतों से इसलिए डर नहीं था कि उनमें हथियार उठाने की बात कही गई थी, बल्कि इसलिए कि वे लोगों को एकजुट कर रहे थे. एक ऐसा गीत, जिसे किसान, छात्र, मजदूर और व्यापारी सभी गा सकते थे, अंग्रेजों की नजर में किसी भी हथियार से ज्यादा प्रभावशाली बन चुका था.
जब भी अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित गीतों की बात होती है तो सबसे पहला नाम 'वंदे मातरम्' का आता है. इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में लिखा और बाद में अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (1882) में शामिल किया. शुरुआत में यह एक साहित्यिक रचना थी, लेकिन 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन ने इसे आजादी का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया.
सड़कों पर हजारों लोग 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करते हुए निकलते थे. स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक सभाओं में यह गीत गूंजने लगा. अंग्रेज प्रशासन को महसूस हुआ कि यह केवल गीत नहीं, बल्कि जनता को एक मंच पर लाने वाली ताकत बन चुका है.
1906 में तत्कालीन पूर्वी बंगाल के बारीसाल में आयोजित एक राजनीतिक सम्मेलन के दौरान अंग्रेज प्रशासन ने 'वंदे मातरम्' के सार्वजनिक गायन और उद्घोष पर रोक लगाने की कोशिश की. इसके बाद कई स्थानों पर छात्रों और आंदोलनकारियों को केवल यह नारा लगाने के कारण गिरफ्तार किया गया.
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण दर्ज हैं, जहां स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों को 'वंदे मातरम्' बोलने पर दंड दिया गया. कुछ स्थानों पर जुर्माना लगाया गया, तो कहीं छात्रों को निष्कासित तक कर दिया गया. इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने यह नारा लगाना बंद नहीं किया. यही कारण था कि 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बन गया.
'वंदे मातरम्' जिस उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा था, वह भी अंग्रेज अधिकारियों की निगरानी में रहा. इस पुस्तक में विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना दिखाई गई थी. इतिहासकारों के अनुसार, अलग-अलग समय और क्षेत्रों में इसकी प्रतियों के प्रसार पर निगरानी रखी गई और कई जगह इसे संदिग्ध साहित्य माना गया. हालांकि पूरे भारत में इस पुस्तक पर एक समान और स्थायी कानूनी प्रतिबंध होने के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए इस विषय में अतिरंजित दावा करना सही नहीं होगा.
'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा मूल रूप से मौलाना हसरत मोहानी ने दिया था, लेकिन इसे पूरे देश में लोकप्रिय बनाने का श्रेय भगत सिंह और उनके साथियों को जाता है. जब भी अदालतों, जेलों या जुलूसों में यह नारा गूंजता था, लोगों में नया उत्साह भर जाता था. अंग्रेज प्रशासन ने ऐसे जुलूसों पर अक्सर बल प्रयोग किया. कई क्रांतिकारियों को इस नारे के साथ प्रदर्शन करने पर गिरफ्तार किया गया. हालांकि इस नारे पर पूरे भारत में अलग से किसी सार्वदेशिक कानूनी प्रतिबंध का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता, लेकिन इसके सार्वजनिक इस्तेमाल को कई बार बलपूर्वक रोका गया.
'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...' आज भी देशभक्ति का प्रतीक मानी जाती है. यह कविता क्रांतिकारी आंदोलन से गहराई से जुड़ गई थी और रामप्रसाद बिस्मिल सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा गाई और पढ़ी जाती थी.
अंग्रेज सरकार ने इस कविता पर अलग से राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने की बजाय इसे क्रांतिकारी साहित्य के रूप में देखा. जहां भी इस कविता की प्रतियां मिलतीं या इसे क्रांतिकारी सभाओं में पढ़ा जाता, वहां पुलिस कार्रवाई करती और साहित्य जब्त कर लिया जाता.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 'भारत माता की जय' भी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया था. जब यह नारा बड़े आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में लगाया जाता, तब पुलिस अक्सर सभाओं को तितर-बितर कर देती थी और कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता था. हालांकि इस नारे पर भी पूरे भारत में अलग से औपचारिक कानूनी प्रतिबंध का प्रमाण नहीं मिलता.
अंग्रेज सरकार को यह समझ आ गया था कि यदि देशभक्ति के गीत और क्रांतिकारी कविताएं गांव-गांव तक पहुंच गईं, तो आंदोलन को रोकना मुश्किल होगा. इसलिए उन्होंने कई प्रेस कानूनों और राजद्रोह संबंधी प्रावधानों का इस्तेमाल कर देशभक्ति साहित्य, पर्चों और पुस्तिकाओं की छपाई और वितरण पर कार्रवाई की.
'मेरा रंग दे बसंती चोला', 'हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा' जैसे कई लोकप्रिय क्रांतिकारी गीतों की मुद्रित प्रतियां भी समय-समय पर जब्त की जाती थीं. उद्देश्य साफ था, लोगों तक आजादी का संदेश पहुंचने से रोकना.
अंग्रेजी शासन को इन गीतों और नारों से तीन बड़े खतरे दिखाई देते थे. पहला, इन्हें समझने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था. एक बार कोई गीत सुन लेता, तो उसे आसानी से याद कर लेता था. दूसरा, ये गीत धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर लोगों को एकजुट कर रहे थे. तीसरा, इनकी वजह से स्वतंत्रता आंदोलन शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंचने लगा था, जिससे अंग्रेजी शासन की पकड़ कमजोर पड़ने लगी.