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Bombay HC: 'नींबू के लिए आधी रात को महिला का दरवाजा खटखटाना बेतुका', हाईकोर्ट ने CISF कर्मी को लगाई फटकार

Bombay HC: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीआईएसएफ कर्मी की ओर से आधी रात समय पर महिला का दरवाजा खटखटाकर उससे नींबू मांगने को बेतुका और अशोभनीय कहा है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने कदाचार के लिए उस पर लगाए गए जुर्माने को रद्द करने से इनकार कर दिया.

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Bombay HC: बॉम्बे हाई कोर्ट ने सीआईएसएफ कर्मी द्वारा की ओर से महिला के दरवाजे पर आधी रात समय के समय दरवाजा खटखटाकर उससे नींबू मांगने को बेतुका और अशोभनीय करार दिया है. अदालत ने इस हरकत के लिए सीआईएसएफ कर्मी पर लगाए गए जुर्माने को रद्द करने से इनकार भी कर दिया. बॉम्बे हाईकोर्ट ने ये फैसला मुंबई में बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड) में तैनात अरविंद कुमार की याचिका पर दिया है. जिसमें उसकी ओर सीआईएसएफ की ओर से लगाए गए जुर्माने को चुनौती दी गई थी.

न्यायमूर्ति नितिन जामदार और न्यायमूर्ति एमएम सथाये की खंडपीठ ने 11 मार्च के अपने आदेश में कहा कि सीआईएसएफ कांस्टेबल ने घटना से पहले शराब पी थी और उसे यह भी पता था कि उसका सहकर्मी, महिला का पति, पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर गया हुआ था और वह अपनी छह साल की बेटी के साथ अकेली थी. 

जानें याचिकाकर्ता ने क्या दी दलीलें? 

अरविंद कुमार का वेतन तीन साल के लिए कम कर दिया गया. इस दौरान उन्हें सजा के तौर पर कोई वेतन वृद्धि भी नहीं मिलेगी. उन पर आरोप है कि 19 अप्रैल और 20 अप्रैल 2021 की मध्यरात्रि को अरविंद कुमार ने अपने पड़ोसी के घर के दरवाजे खटखटाए, जिसमें शिकायतकर्ता महिला और उसकी छह साल की बेटी रहती थी. महिला ने कहा कि वह डर गई और अरविंद कुमार से कहा कि उसका पति पश्चिम बंगाल में ड्यूटी पर है और इसलिए उसे उसे परेशान नहीं करना चाहिए. महिला की चेतावनी और धमकी के बाद ही अंरविद कुमार वहां से चला गया. अरविंद कुमार ने अपने बचाव में दावा किया कि वह अस्वस्थ महसूस कर रहे थे और केवल नींबू मांगने के लिए पड़ोसी का दरवाजा खटखटाया था.

जानें अदालत ने क्या दी दलीलें? 

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने घटना से पहले शराब पी थी और उसे यह भी पता था कि शिकायतकर्ता महिला का पति उस समय घर पर मौजूद नहीं था. अदालत ने कुमार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण सीआईएसएफ के एक अधिकारी के लिए अशोभनीय है. हमारे विचार में याचिकाकर्ता का इरादा निश्चित रूप से उतना वास्तविक और स्पष्ट नहीं पाया गया जितना आरोप लगाया गया है. अदालत की पीठ ने कुमार की इस दलील को भी मानने से इनकार कर दिया कि यह घटना कदाचार की श्रेणी में नहीं आती है क्योंकि कथित घटना के समय वह ड्यूटी पर नहीं थे और कहा कि केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों के तहत उन्हें ईमानदारी बनाए रखने और ऐसा कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है जिससे कोई नुकसान हो.