नई दिल्ली: सत्ता की गलियारों में सोमवार को उस वक्त हलचल मच गई जब लोकसभा की कार्यवाही के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक अप्रकाशित संस्मरण का हवाला दिया. यह मामला पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवाणे की किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' से जुड़ा था, जो अभी आधिकारिक रूप से बाजार में नहीं आई है. इस घटना ने न केवल सदन में शोर-शराबे को जन्म दिया, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संसदीय नियमों पर एक नई बहस छेड़ दी है.
विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने लद्दाख गतिरोध पर जनरल नरवाणे के संस्मरणों पर आधारित एक लेख पढ़ना शुरू किया. उन्होंने दावा किया कि लेख में सीमा विवाद के दौरान लिए गए महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र है. इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने तुरंत मोर्चा संभाला. सरकार का तर्क था कि जो किताब अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है, उसे सदन में सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ और भ्रामक है.
सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मीडिया के सामने आकर राहुल गांधी का पुरजोर बचाव किया. थरूर ने कहा कि राहुल गांधी किसी सैनिक या सेना पर सवाल नहीं उठा रहे थे, बल्कि उनका निशाना केंद्र सरकार की नीतियों पर था. उन्होंने अफसोस जताया कि सरकार ने इस मामले में जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देकर चर्चा को रोकने की कोशिश की. थरूर के अनुसार, तथ्यों को दबाने के बजाय उन पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए.
अपनी बात को वजन देने के लिए थरूर ने 1962, 1965 और 1971 के युद्धों का उदाहरण दिया. उन्होंने याद दिलाया कि पंडित नेहरू के समय युद्ध के दौरान भी संसद में तीखी बहसें होती थीं और सरकारी सांसदों ने भी अपनी ही सरकार की आलोचना की थी. थरूर का मानना है कि लोकतंत्र की ताकत चर्चा में है, न कि उसे दबाने में. उन्होंने कहा कि अगर तथ्य गलत थे, तो सरकार को उन्हें सदन के पटल पर सुधारना चाहिए था.
स्थगन के बाद राहुल गांधी के कार्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल जैसे दिग्गज शामिल हुए. विशेष बात यह रही कि शशि थरूर भी इस बैठक का हिस्सा थे. राजनीतिक विश्लेषक इसे राहुल और थरूर के बीच बेहतर होते रिश्तों के तौर पर देख रहे हैं. थरूर, जो कभी पार्टी के भीतर असंतुष्ट गुट का हिस्सा माने जाते थे, अब राहुल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई दिए.