मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव 2026 नजदीक आते ही शहर के विकास को लेकर बहस तेज हो गई है. सवाल साफ है- क्या मुंबई तेज गति से आगे बढ़ेगी या फिर विकास पर एक बार फिर ‘स्पीडब्रेकर’ लग जाएगा? पिछले कुछ वर्षों का अनुभव इस बहस को और अहम बना देता है.
2014 से 2019 के बीच देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में मुंबई ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखा. मेट्रो नेटवर्क, कोस्टल रोड और मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (अटल सेतु) जैसे बड़े प्रोजेक्ट सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जमीन पर दिखने लगे. इस दौर में फैसले तेज हुए और काम की स्पीड भी बढ़ी, जिससे आम मुंबईकर को राहत मिलने की उम्मीद जगी.
2019 में बनी महाविकास आघाड़ी (MVA) सरकार पर आरोप लगे कि विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई. मेट्रो-3 के आरे कारशेड जैसे मुद्दों पर फैसले टलते रहे. इससे न सिर्फ लागत बढ़ी, बल्कि प्रोजेक्ट्स में कई साल की देरी भी हुई. आम लोग ट्रैफिक जाम, गड्ढों और रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते रहे.
कोरोना काल के दौरान आम मुंबईकर मुश्किल में था, वहीं उस समय कुछ घोटालों और विलासिता के आरोप भी सामने आए. आलोचकों का कहना है कि जनता की समस्याएं प्राथमिकता नहीं बन पाईं और राजनीति विकास पर भारी पड़ी.
2022 के बाद महायुति सरकार के सत्ता में आने से कई रुके प्रोजेक्ट्स दोबारा शुरू हुए. अटल सेतु जैसे बड़े प्रोजेक्ट पूरे हुए, कोस्टल रोड पर ट्रैफिक आसान हुआ और मेट्रो नेटवर्क का विस्तार तेज़ हुआ. बुलेट ट्रेन परियोजना पर भी काम आगे बढ़ा.
2024 के विधानसभा चुनाव के बाद महायुति सरकार फिर बनी है. अब BMC चुनाव में मुंबईकरों को तय करना है कि वे तेज विकास चाहते हैं या फिर ठहराव का जोखिम. सवाल यही है- मुंबई को ‘विकास एक्सप्रेस’ चाहिए या फिर एक और ‘स्पीडब्रेकर’?