सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग, केंद्र और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाब मांगे जाने के बाद BJP ने सोमवार को प्रतिक्रिया दी. पार्टी प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा ने कहा कि अदालत में याचिका दाखिल होना, उसकी सुनवाई होना और संबंधित पक्ष को जवाब देने का अवसर मिलना लोकतांत्रिक और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है.
दिल्ली स्थित BJP मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पात्रा ने कहा कि इस मामले में एक प्रक्रिया चल रही है और यह न्यायपालिका के तहत हो रही है. उन्होंने उन राजनीतिक दावों का भी जिक्र किया, जिनमें देश में तानाशाही जैसे हालात होने की बात कही गई थी. पात्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और नोटिस जारी होना इस बात का उदाहरण है कि संस्थागत प्रक्रिया काम कर रही है.
Delhi: BJP MP Sambit Patra says, "You asked me about the hearing of the PIL filed in the Supreme Court regarding the Election Commission. This is a process. Approaching the Supreme Court with a PIL, the Supreme Court hearing the matter and issuing a notice so that the other side can also be heard — this is a democratic process and a judicial process. So naturally, a process is underway. This is a process under the judiciary. But today, I want to ask a question to those who, throughout this episode, used to say that India is functioning under Hitler’s rule and that there is dictatorship in India..."
— IANS (@ians_india) October 5, 2026
सुप्रीम कोर्ट की CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग, केंद्र, CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जवाब मांगा है. याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी के बिना लिए गए.
अदालत ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया. पीठ ने कहा कि वह केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकती. अदालत पहले संबंधित रिकॉर्ड और पक्षों के जवाब देखना चाहती है.
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि किसी फैसले को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सर्वसम्मति या बहुमत से मंजूरी नहीं मिली थी, तो अदालत उस फैसले पर रोक लगाने या उसे कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित करने पर विचार कर सकती है.
मामले में Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसलों के साथ Form 6 और चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर में कथित बदलाव का मुद्दा भी उठाया गया है. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR से जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्तियां दर्ज की थीं. हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार होना सामान्य है और SIR से जुड़े उसके फैसले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए हैं.