नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के नतीजे जितना जोश बीजेपी के लिए लेकर आए हैं उससे कहीं ज्यादा उदासी ममदा दीदी को लेकर आए हैं. जहां भाजपा ने डबल सेंचुरी लगाई है तो वहीं टीएमसी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. बंगाल में सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत है और इस आधार पर भाजपा को बहुत बड़ी जीत मिली है.
वहीं इस चुनाव नतीजे में ममता दीदी ने सिर्फ बंगाल की कुर्सी नहीं खोई है बल्कि उनकी कई आशाओं को भारी झटका लगा है. टीएमसी की यह हार राज्य तक सीमित नहीं रेगी बल्कि इसका असर दिल्ली तक दिखाई देगा. इस हार से ममता दीदी का कद भी छोटा हुआ है. दरअसल 2024 से पहले और उसके बाद भी विपक्ष में कई बार यह मांग उठी थी कि इंडिया अलाइंस की कमान सौंप दी जाए. इस हार से अब यह सुर शांत हो जाएंगे.
ममता दीदी की बंगाल में हार ने उनके राष्ट्रीय नेतृत्व करने की उम्मीद पर पूरी तरह पूर्णविराम लगा दिया है. ममता जब अपने ही गढ़ में हार गई हैं तो फिर इंडिया अलाइंस की कमान संभालने का ख्वाब पूरा होना आसान नहीं है. साथ ही अपनी पार्टी को पहले की तरह मजबूत बनाना भी एक चुनौती होगी. बंगाल में जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें पूरी संभावनाएं हैं कि टीएमसी के जीते हुए विधायक भी पलटी मार दें और बीजेपी में शामिल हो जाएं.
बंगाल की हार और भी कई फैक्टर्स में असर डालेगी. इसका सीधा असर राज्यसभा पर भी पड़ेगा. राज्यभा का समीरकरण भी पूरी तरह बदल जाएगा. भाजपा की राज्यसभा सीटों में भी इजाफा होगा. इस तरह ये नतीजे सीधे तौर पर संसद पर गहरा असर डालेंगे. साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी की क्षमताओं पर भी नजर रहेगी कि आखिर तब तक पार्टी कितनी मजबूत रह पाएगी.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद लोकसभा सीटों के आधार पर बंगाल का तीसरा स्थान है. बंगाल में 42 लोकसभा सीटें हैं. ऐसे में 2029 के चुनावों में अगर भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम सीटें भी आती हैं तो बंगाल में उसे बैलेंस किया जा सकेगा. ममता की हार से विपक्ष सामूहिक रूप से तो स्पष्ट तौर पर कमजोर हुआ है, लेकिन कांग्रेस को इससे खास असर नहीं होगा. इसका कारण यह है कि ममता दीदी अक्सर कांग्रेस के नेताओं को ही टारगेट करती हैं. ऐसे में केरल में जीतकर कांग्रेस ने अपनी बढ़त बढ़ा ली है.