नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से रैलियों, आंदोलनों और बंद के जरिए संचालित होती रही है. आजादी के बाद कांग्रेस, फिर 1977 में वाम मोर्चा और 2011 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इसी रास्ते से सत्ता हासिल की. ममता बनर्जी इस परंपरा की सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरीं, जिन्होंने खुद सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया और विरोधियों को हराया. लेकिन 2026 के चुनाव में यही राजनीतिक शैली उनके लिए चुनौती बन गई.
पश्चिम बंगाल में पहली बार ऐसा हुआ है कि केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में आई है. यह बदलाव दशकों बाद देखने को मिल रहा है. चुनाव आयोग के अनुसार सोमवार शाम करीब 6 बजे तक भाजपा 44 सीटें जीत चुकी थी और 160 सीटों पर आगे चल रही थी. वहीं टीएमसी 21 सीटें जीतकर 62 सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी. यह आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि बंगाल की राजनीति में बड़ा परिवर्तन हो चुका है.
ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी. 71 वर्ष की उम्र में उन्होंने दो महीनों में 90 रैलियां और 22 रोड शो किए. उनका नारा- 'मैं सभी सीटों की उम्मीदवार हूं', इस बार भी उनकी रणनीति का केंद्र रहा. हालांकि, इतने व्यापक प्रचार के बावजूद भाजपा के बड़े नेताओं और पार्टी संगठन ने उन्हें कड़ी टक्कर दी. अंततः यह प्रयास चुनावी नतीजों में अपेक्षित असर नहीं दिखा पाया.
विश्लेषकों का मानना है कि 15 साल पुरानी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी एक बड़ा कारण रही. भ्रष्टाचार के आरोप और प्रशासनिक थकान ने जनता के बीच असंतोष को बढ़ाया. राजनीतिक विश्लेषक उदयन बंदोपाध्याय के अनुसार, राजनीतिक एंटी-इंकंबेंसी के साथ-साथ बेरोजगारी और उद्योगों की कमी से पैदा हुई मांग आधारित नाराजगी ने भी ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनाया.
चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) ने भी बड़ा असर डाला. अक्टूबर में घोषित इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 7.66 करोड़ मतदाताओं में से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए. इनमें 63 लाख मृत या अनुपस्थित मतदाता और 27 लाख ऐसे लोग शामिल थे जिन्हें दस्तावेजी विसंगतियों के कारण अयोग्य घोषित किया गया. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग के जरिए उनके समर्थकों के नाम हटवाए.
राजनीतिक ध्रुवीकरण इस चुनाव का एक अहम पहलू रहा. भाजपा ने घुसपैठ और भ्रष्टाचार के मुद्दों को प्रमुखता दी, जबकि ममता सरकार ने सामाजिक योजनाओं पर जोर दिया. महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार योजना, छात्रों और किसानों के लिए आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं के बावजूद वोटिंग पैटर्न में बदलाव दिखा. भाजपा के 3000 मासिक सहायता के वादे ने भी असर डाला. विशेषज्ञों का कहना है कि मुस्लिम मतदाताओं का एक हिस्सा भी भाजपा की ओर गया, जिसका कारण रोजगार की कमी और पलायन बताया गया.
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है. 1984 में उन्होंने जादवपुर से सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर पहचान बनाई. 2000 के बाद उनके आंदोलनों और नंदीग्राम-सिंगूर जैसे मुद्दों ने वाम मोर्चा सरकार को कमजोर किया. 2011 में उन्होंने 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर सत्ता हासिल की, लेकिन समय के साथ विपक्ष को कमजोर करने की उनकी रणनीति उनके खिलाफ भी गई.
2026 का जनादेश यह दर्शाता है कि बंगाल की जनता बदलाव चाहती थी. भाजपा का चुनावी नारा- 'पल्टानो दरकार, चाही भाजपा सरकार', अब जमीन पर उतरता दिख रहा है. यह चुनाव न केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत है, बल्कि राज्य की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत भी माना जा रहा है.