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असम में SIR पर छिड़ा सियासी संग्राम, फॉर्म-7 के इस्तेमाल पर आमने-सामने सरकार और विपक्ष

असम में विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर का मुद्दा काफी तेजी से विवादों में घिरा है. एक ओर विपक्षी पार्टियां इसे नागरिकों को परेशान करने का तरीका बता रही है. वहीं राज्य सरकार इस पूरे अभ्यास को कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया बता रही है.

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Edited By: Shanu Sharma
असम में SIR पर छिड़ा सियासी संग्राम, फॉर्म-7 के इस्तेमाल पर आमने-सामने सरकार और विपक्ष
Courtesy: ANI

नई दिल्ली: असम में विधानसभा चुनाव होना है, उससे पहले SIR अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के तहत फॉर्म-7 का गलत इस्तेमाल कर वास्तविक और योग्य नागरिकों को परेशान किया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार और चुनाव विभाग इस पूरे अभ्यास को कानूनी और पारदर्शी बताते हुए किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार कर रहे हैं.

फॉर्म-7 एक वैधानिक प्रावधान है, जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति वोटर लिस्ट में दर्ज किसी नाम पर आपत्ति जता सकता है या मृत्यु, स्थान परिवर्तन अथवा अन्य कारणों से नाम हटाने की मांग कर सकता है. विपक्ष का आरोप है कि इसी फॉर्म का दुरुपयोग कर अल्पसंख्यक और कमजोर तबकों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है.

विपक्षी पार्टियों के गंभीर आरोप

विपक्ष के आरोपों के बाद राज्य चुनाव विभाग ने अपनी सार्वजनिक एडवाइजरी में साफ किया है कि फॉर्म-7 भरने से किसी का नाम अपने आप वोटर लिस्ट से नहीं हट जाता है. नाम हटाने के लिए हर आपत्ति एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से गुजरती है, जिसमें फील्ड वेरिफिकेशन और संबंधित वोटर को नोटिस देना शामिल है.

विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से अपील की है कि रिवीजन के दौरान किसी भी योग्य मतदाता का नाम न हटाया जाए. CPI(M), CPI, CPI(ML), फॉरवर्ड ब्लॉक और SUCI(C) ने संयुक्त बयान में आरोप लगाया कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल अल्पसंख्यक वोटरों को निशाना बनाने के लिए हो रहा है. वहीं कांग्रेस ने बोको-छागांव क्षेत्र में स्थानीय बीजेपी नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ कथित तौर पर बिना अनुमति नाम जोड़ने और हटाने को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. विपक्ष ने दावे और आपत्तियों के निपटारे की अंतिम तिथि 2 फरवरी को आगे बढ़ाने की भी मांग की है.

सीएम हिमंत बिस्वा ने क्या कहा?

दावोस में चल रहे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से लौटने के बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पेशल रिवीजन प्रक्रिया का खुलकर बचाव किया है. उन्होंने कहा कि नोटिस केवल बांग्लादेश मूल के मुस्लिम प्रवासियों को दिए जा रहे हैं, न कि स्थानीय हिंदू या असमिया मुस्लिम परिवारों को. सीएम ने विवाद को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह कार्रवाई कथित अवैध प्रवासियों पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है. हालांकि उनके इस बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है.

चुनाव विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना किसी भी मतदाता का नाम हटाया नहीं जा सकता. विभाग ने वोटरों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं और सत्यापन के दौरान अधिकारियों का सहयोग करें.