Maharashtra Sugar Mill Loan: महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) का एक कदम सवाल खड़े कर रहा है. एनसीडीसी ने राज्य सरकार को 1898 करोड़ रुपये के वर्किंग कैपिटल लोन को मंजूरी दी है. इस राशि का इस्तेमाल राज्य की 13 बीमार चीनी मिलों को चालू रखने में किया जाएगा.
लेकिन असल मुद्दा यह है कि इन 13 मिलों में से 5 का संबंध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेताओं से है, जबकि बाकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पदाधिकारियों और उनके सहयोगियों से जुड़ी हैं. इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह कर्ज वाकई सहयोग है या फिर चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में वोट जुटाने का दांव?
गौर करने वाली बात यह है कि एनसीडीसी सहकारिता मंत्रालय के अधीन एक सांविधिक निगम है, जिसकी स्थापना 2021 में हुई थी और तब से गृह मंत्री अमित शाह इसके प्रमुख रहे हैं. ऐसे में इस लोन को मंजूरी देना कितना पारदर्शी रहा है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं.
लोन की बात करें तो यह रकम फ्लोटिंग ब्याज दर पर दी गई है. अवधि आठ साल की है, जिसमें मूल राशि के भुगतान पर दो साल की मोहलत भी शामिल है. हालांकि, ब्याज के भुगतान पर कोई रोक नहीं है. गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पहले भी बीमार चीनी मिलों को इसी तरह के लोन मंजूर किए गए थे.
अब आते हैं इन मिलों की खस्ता हालत पर. दरअसल, ये मिलें कार्यशील पूंजी जुटाने में असमर्थ हैं. इस कार्यशील पूंजी का इस्तेमाल मुख्य रूप से रखरखाव, वेतन, पेंशन और गन्ना किसानों के बकाया भुगतान आदि में किया जाता है.
यहां चीनी उद्योग विशेषज्ञ विजय औताडे की बात गौर करने लायक है. उनका कहना है कि "इस लोन का इस्तेमाल नए बुनियादी ढांचे के विकास के लिए नहीं किया जा सकता है. इसका इस्तेमाल सिर्फ वेतन भुगतान और रखरखाव कार्यों को करने के लिए किया जाना चाहिए."
वास्तव में कई चीनी कारखानों को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिनके लिए ठोस और दीर्घकालिक समाधानों की जरूरत है. अन्यथा, यह 1898 करोड़ का लोन एक अस्थायी समाधान है और इन मिलों को हर बार संकट में फंसने पर कर्ज लेना पड़ेगा.
पी जी मेढ़े, एक अन्य उद्योग विशेषज्ञ, समस्या की जड़ पर पहुंचते हैं. उनका कहना है कि चीनी मिलों को घाटे से निकालने के लिए गन्ने का न्यूनतम विक्रय मूल्य बढ़ाकर 42 रुपये प्रति किलो करने और इथेनॉल की दरों में संशोधन करना आवश्यक है.
मेढ़े ने कहा, "पिछले पांच वर्षों में गन्ना किसानों को मिलने वाले लाभकारी मूल्य में पांच गुना वृद्धि हुई है, जो 2,750 रुपये प्रति टन से बढ़कर 3,450 रुपये प्रति टन हो गया है, लेकिन चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं बढ़ाया गया है. इस वजह से मिलों को प्रति टन 500 से 600 रुपये का नुकसान हो रहा है, जिसके चलते उन पर कर्ज बढ़ता जा रहा है."
अंत में, यह कहना मुश्किल है कि एनसीडीसी का यह कदम कितना फायदेमंद होगा. फिलहाल तो यह बीमार चीनी मिलों को थोड़ी राहत जरूर दे सकता है, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए सरकार को चीनी उद्योग की समस्याओं का मूल कारण ढूंढकर उसका समाधान करना होगा. वरना चुनाव दर चुनाव इसी तरह कर्ज बांटने का सिलसिला जारी रहने की आशंका है.