यूनिवर्सिटी, कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए लाए गए यूजीसी के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार घिरती नजर आ रही है. व्यापक विरोध के चलते केंद्र सरकार इन नियमों को वापस लेने को लेकर कदम उठा सकती है. टॉप लेवल सूत्रों ने कहा कि नए नियमों को लेकर गलत तरीके से धारणा बन रही है, इसे खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे.
सूत्रों के मुताबिक, साल 2012 के प्रावधानों को आधार बनाकर ही नए नियमों में कुछ बदलाव किया जा सकता है, जिसके तहत भेदभाव को लेकर शिकायतों पर भी ध्यान दिया जाए और किसी भी वर्ग को अपने साथ अन्याय की आशंका न रहे.
सूत्रों के मुताबिक, नए नियमों को गलत तरीके से सामने लाया जा रहा है जबकि सरकार चाहती है कि किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव न हो, लेकिन नए नियमों को जहां सवर्णों के खिलाफ बताया जा रहा है, वहीं एससी, एसटी व अन्य पिछड़ा वर्ग को भी आशंका है कि नए नियमों से उनके साथ भेदभाव को खत्म करने के लिए बनाए गए नियमों का असर कम किया जा रहा है. फीडबैक को ध्यान में रखते हुए सरकार अब नए नए नियमों में संशोधन कर सकती है या इन नियमों को वापस ले सकती है.
गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए साल 2012 के पुराने नियमों के स्थान पर 15 जनवरी 2026 को पूरे देश में नए नियम लागू किए गए.
बीएचयू के छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने यूजीसी के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि विनियमन 3 (ग) जाति आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करता है. याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यूजीसी विनियम 3 (ग) को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किआ जाया या उसमें संसोधन का निर्देश दिया जाए ताकि सवर्णों समेत किसी भी जाति के साथ होने वाले भेदभाव तो चुनौती दी जा सके.