'जब सीएम को नहीं मिल रहा तो आम आदमी का क्या होगा', दिल्ली हाई कोर्ट से AAP ने केजरीवाल की जमानत पर लगाई गुहार
Arvind Kejriwal Bail: दिल्ली शराब नीति मामले में जेल में बंद अरविंद केजरीवाल को भले ही निचली अदालत ने जमानत देने का फैसला सुनाया लेकिन हाई कोर्ट के रोक के चलते वो जेल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी ने सीएम केजरीवाल को जमानत न देने पर चिंता जताई है और दिल्ली हाई कोर्ट में इसको लेकर अपनी बात भी कही है.
Arvind Kejriwal Bail: आम आदमी पार्टी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जमानत पर दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से हाल ही में लगाए गए स्टे के आदेश पर चिंता जताई है. पार्टी ने आदेश के अननैचुरल नेचर और स्टे के टाइमगैप पर सवाल उठाया.
जब सीएम को नहीं मिल रहा तो आम आदमी का क्या होगा?
आप के कानूनी सलाह के प्रमुख और वकील संजीव नासियार ने कहा, 'हम चिंतित हैं. एक आम आदमी न्याय की उम्मीद लेकर आता है. अगर एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को न्याय नहीं मिल रहा है, तो एक आम आदमी न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है? हमने अपील की है कि इस पर गौर किया जाना चाहिए.'
उन्होंने मामले की गहन जांच की अपील की और जोर दिया कि निचली अदालत के आदेशों को कानूनी मापदंडों के भीतर चुनौती दी जानी चाहिए.
कानून के बाहर जाकर नहीं लगा सकते रोक
नासियार ने कहा, 'हमने अपील की है कि इस पर गौर किया जाना चाहिए. अगर निचली अदालत के न्यायाधीश ने कोई आदेश दिया है, तो उसे कानूनी मापदंडों के भीतर चुनौती दी जानी चाहिए.'
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 25 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर याचिका के जवाब में केजरीवाल की जमानत पर रोक लगा दी थी. न्यायमूर्ति सुधीर कुमार जैन की पीठ ने 20 जून को ट्रायल कोर्ट द्वारा कथित मनी लॉन्ड्रिंग आबकारी घोटाले में दिए गए जमानत आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि 'ट्रायल कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केजरीवाल को जमानत देते समय अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया.'
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बताया अजीब
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ईडी द्वारा उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री की सराहना करने में विफल रहा और न्यायाधीश को जमानत याचिका पर निर्णय लेते समय ईडी को पर्याप्त अवसर देना चाहिए था.
इससे पहले, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की सुप्रीम कोर्ट की अवकाश पीठ ने कहा कि केजरीवाल की जमानत पर अंतिम आदेश जारी किए बिना अंतरिम रोक लगाने का हाईकोर्ट का निर्णय 'असामान्य' था.
पीठ ने टिप्पणी की, 'स्थगन मामलों में, निर्णय सुरक्षित नहीं रखे जाते बल्कि मौके पर ही पारित किए जाते हैं. यहां जो हुआ है वह असामान्य है. हम इसे (मामले को) अगले दिन सुनेंगे.'