US Israel Iran War

मिडिल ईस्ट तनाव से तेल की कीमतों में लगी आग, पाकिस्तान में हाहाकार लेकिन भारत में क्यों नहीं बढ़े दाम? समझें पूरा गणित

ईरान युद्ध के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं. वहीं भारत में दाम बढ़ते नहीं दिख रहे हैं.

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Ashutosh Rai

ईरान और मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव ने दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आग लगा दी है. एक तरफ पूरा विश्व पेट्रोल के दाम लगातार बढ़ाता दिख रहा है, तो वहीं भारत में अभी तक ऐसा कोई असर देखने को नहीं मिला है. कई देशों में उछाल इतना भारी देखने को मिला है कि वहां की जनता 2008 की मंदी की तरह तैयारियां करने लग गई है. बता दें कि आने वाले समय में इसका असर भारत में जल्द देखने को मिल सकता है. फरवरी के आखिर में संकट के गहराने के कुछ ही दिनों के भीतर, कई देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ने लगीं, जिसका असर परिवहन लागत से लेकर घरेलू बजट तक हर चीज पर पड़ रहा है.

इन देशों में सबसे ज्यादा पड़ी महंगाई की मार

ग्लोबल फ्यूल ट्रैकर (23 फरवरी से 11 मार्च) के 95-ऑक्टेन पेट्रोल के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं. आयात पर निर्भर देशों का हाल सबसे बुरा है:

  • कंबोडिया और वियतनाम: कंबोडिया में पेट्रोल 67.81% महंगा हो गया है, जबकि वियतनाम में 49.73% का भयंकर उछाल आया है.
  • पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान: यहां कीमतों में 24.49% की बढ़ोतरी हुई है. हालात इतने खराब हैं कि पाकिस्तान को 4 दिन का वर्किंग वीक लागू करना पड़ा है और स्कूल तक बंद कर दिए गए है.
  • विकसित देश भी पस्त: कनाडा में 28.36%, अमेरिका में 16.55% और जर्मनी में 13.30% तक कीमतें बढ़ चुकी हैं.

एशिया के देशों में इमरजेंसी जैसे हालात

खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर एशिया का हाल सबसे बुरा है. 95% तेल आयात करने वाले जापान को अपने रिजर्व से तेल निकालना पड़ रहा है. वहीं, दक्षिण कोरिया ने 30 साल में पहली बार फ्यूल की कीमतों पर ऊपरी लिमिट (कैप) लगा दी है. ऊर्जा बचाने के लिए बांग्लादेश को अपनी यूनिवर्सिटीज़ बंद करनी पड़ी हैं.

भारत में आम जनता को राहत क्यों है?

इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत एक बड़ा अपवाद है. अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदने के बावजूद, 28 फरवरी से 19 मार्च के बीच दिल्ली (₹94.77) और मुंबई (₹103.50) में पेट्रोल की कीमतें जस की तस बनी हुई हैं. दरअसल, भारत में पेट्रोल के दाम पूरी तरह से बाजार के हवाले नहीं हैं. सरकार का प्रशासनिक कंट्रोल और टैक्स ढांचा इस वैश्विक झटके को आम जनता तक पहुँचने से रोक रहा है.

खतरे की घंटी

राहत हमेशा के लिए नहीं है. अगर कच्चे तेल के दाम ऐसे ही ऊंचे रहे, तो तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMC) को भारी नुकसान होगा. अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इस संकट से ट्रांसपोर्ट, खाद और हर तरह का सामान महंगा हो जाएगा. अगर हालात न सुधरे, तो दुनिया 1973, 1978 और 2008 जैसी भयंकर आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है.