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आमिर खान की फिल्म 'सितारे जमीन पर' ने बताया डाउन सिंड्रोम बीमारी का दर्दनाक सच, जानें कैसी होती है ऐसे लोगों की दुनिया

डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है, जो 21वें क्रोमोसोम की अतिरिक्त कॉपी के कारण होता है. इसका इलाज संभव नहीं है, लेकिन थेरेपी और सही देखभाल से बच्चों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है. जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है.

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Km Jaya

नई दिल्ली: हर साल 21 मार्च को World Down Syndrome Day मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य डाउन सिंड्रोम के बारे में लोगों को जागरूक करना है. यह दिन खास इसलिए चुना गया है क्योंकि इस बीमारी का संबंध 21वें क्रोमोसोम से होता है. डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है, जो बच्चे में जन्म से पहले ही विकसित हो जाता है. 

इसमें बच्चे के शरीर में 21वें क्रोमोसोम की एक अतिरिक्त कॉपी मौजूद होती है, जिससे उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है. इस विषय को आम लोगों तक पहुंचाने में आमिर खान की फिल्म 'सितारे जमीन पर' ने अहम भूमिका निभाई. फिल्म में ऐसे बच्चों की चुनौतियों और उनकी भावनाओं को दिखाया गया, जिससे समाज में जागरूकता बढ़ी.

कितने प्रकार की होती हैं डाउन सिंड्रोम?

डाउन सिंड्रोम के मुख्य तीन प्रकार होते हैं. पहला ट्राइसॉमी 21, जो सबसे सामान्य है और इसमें शरीर की सभी कोशिकाओं में अतिरिक्त क्रोमोसोम होता है. दूसरा ट्रांसलोकेशन, जो दुर्लभ होता है और इसमें क्रोमोसोम का हिस्सा किसी अन्य क्रोमोसोम से जुड़ जाता है. तीसरा मोजेक प्रकार जिसमें केवल कुछ कोशिकाओं में ही अतिरिक्त क्रोमोसोम पाया जाता है.

क्या होते हैं इस बीमारी के लक्षण?

इस बीमारी से प्रभावित बच्चों में कई शारीरिक लक्षण दिखाई दे सकते हैं. आमतौर पर उनका चेहरा चपटा, आंखें ऊपर की ओर झुकी हुई, कान छोटे और मांसपेशियां कमजोर होती हैं. इसके अलावा उन्हें बोलने और सीखने में भी कठिनाई हो सकती है और उनका विकास सामान्य बच्चों की तुलना में धीमा होता है.

डाउन सिंड्रोम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम भी होते हैं. इनमें दिल की बीमारी, सुनने और देखने में समस्या, थायरॉयड, सांस से जुड़ी परेशानियां और नींद संबंधी दिक्कतें शामिल हैं. कुछ मामलों में उम्र से पहले अल्जाइमर जैसी समस्या भी देखने को मिल सकती है.

क्या इसका इलाज संभव है?

हालांकि इसका कोई पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन सही समय पर थेरेपी और देखभाल से इन बच्चों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है. स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी और विशेष शिक्षा के जरिए उनकी क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है.

डॉक्टरों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड से इस बीमारी का शुरुआती पता लगाया जा सकता है. जन्म के बाद भी विशेष जांच के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है.